गुरुवार, 11 सितंबर 2008

राज्यलक्ष्मी (महायोग लक्ष्मी) मांत्रोक्त साधना

यह साधना राज्य पक्ष को अपने अनुकूल करने की साधना है। राज्य का तात्पर्य व्यक्ति के जीवन में कर, मुकदमा इत्यादि से आने वाली बाधाओं से है। हर व्यक्ति का नित्य राज्य -पक्ष के पचास कार्यालयों में कार्य पड़ता है और यदि ये कार्य सरल रूप से हो जाए तो व्यक्ति अपने जीवन में शीघ्र उन्नति कर सकता है और इसका एक ही उपाय है, राज्य लक्ष्मी महायोग मांत्रोक्त साधना।

केवल व्यापारी ही नहीं, सामान्य वर्ग भी राज्यपक्ष से विवाद में फंसना नहीं चाहता क्योंकि सामान्य व्यक्ति के पास इतने साधन नहीं होते, जिससे वह पुरे राजतंत्र और उसकी जटिलताओं से बच कर निकल सके। ऐसे में क्या उपाय शेष रह जाता है? क्या व्यक्ति ऐसे ही विभिन्न कार्यालयों के चक्कर काटता रहे और अपने जीवन के सुख-चैन, शांति के क्षण दिन-दिन भर कोर्ट कचहरी के जटिल और उबाऊ कार्य पद्धति में खपा दे? क्या वह एक सामान्य से कार्य के लिए अधिकारियों के दरवाजे पर नाक घिसता रहे और अपने स्वाभिमान व आत्मसम्मान को गिरवी रख दे? निश्चित रूप से नहीं। ऐसी दशा में तो एक ही प्रयोग शेष रह जाता है, की वह अपने जीवन में पूर्णता से राज्यलक्ष्मी की साधना सम्पन्न करे। इस लेख में दिए गए अन्य प्रयोगों की भांति यह भी तांत्रोक्त प्रयोग है।

जीवन में व्याप्त ऐसी प्रत्येक कटु व अपमानजनक स्थितियों के निवारण की व्यावहारिक विधि है। निवारण का तात्पर्य यह नहीं होता हम किसी का विनाश कर देंगे, अपितु यह होता है कि दुर्भाग्यवश जो हमारे जीवन में प्रतिकूल स्थिति है वह समाप्त हो, तथा अनुकूलता प्रारम्भ हो। राज्यलक्ष्मी प्रयोग ऐसा ही प्रयोग है, राज्य पक्ष में मधुरता व सहजता की स्थिति निर्मित करने का प्रयोग है।

साधक के लिए आवश्यक है कि वे पूर्ण रूप से सिद्ध लक्ष्मी लघु शंख प्राप्त करें और उसे पूरी तरह से काजल में रंग दे तथा मूंगे की माला द्वारा निम्न मंत्र का पांच माला मंत्र जप करें।

यह प्रयोग मंगलवार के दिन ही किया जा सकता है। मंत्र जप की समाप्ति पर साधक मूंगे की माला को स्वयं धारण करें तथा शंख को काले कपड़े में लपेट कर जेब अथवा बैग में रखें जिस पर किसी कि नजर न पड़े।

मंत्र
॥ ॐ श्रीं श्रीं राज्यलक्ष्म्यै नमः ॥


जब भी आवश्यकता हो, तब उपरोक्त शंख को वार्तालाप करते समय अपने साथ ले जाएं और आप पाएंगे कि स्थितियां आपके अनुकूल हो रही हैं। अनावश्यक रूप से लगने वाली बाधाएं और अड़चनें समाप्त हो रही हैं तथा आपके प्रति सहयोग का वातावरण बनने लगा है। सामान्य साधक भी ऐसे शंख को अपने साथ रखकर जिस दिन मुकदमों में पेशी हो या कहीं अन्य कोई महत्वपूर्ण कार्य हो तो इसका प्रभाव प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं।

-मंत्र-तंत्र-यंत्र पत्रिका, फरवरी २००८

गुरुवार, 28 अगस्त 2008

नैना अंतरि आव तूं

भारत की महान अध्यात्मिक परम्परा में श्री रामकृष्ण परमहंस का नाम अमर है, और अमर है नाम उन्हीं के द्वारा प्राप्त उनके शिष्य विवेकानंद का।

स्वामी विवेकानंद किस प्रकार में गुरुत्व को उतार कर, साक्षात श्री रामकृष्ण परमहंस का 'मुख' ही कहेलाने के बाद भी अंतिम क्षणों तक केवल शिष्य ही बने रहे, इसके संदर्भ में एक घटना का विवरण रोचक रहेगा।

... प्रारम्भ के दिन थे जब स्वामी विवेकानंद, स्वामी विवेकानंद नहीं वरन नरेंद्र दत्त और अपने गुरु के लिए केवल नरेन् ही थे। नरेन् अपने गुरुदेव से मिलने प्रायः दक्षिणेश्वर आया करते थे और गुरु शिष्य की यह अमर जोड़ी पता नहीं किन-किन गूढ़ विषयों के विवेचन में लीन रहकर परमानंद का अनुभव करती थी। एक बार पता नहीं श्री रामकृष्ण को क्या सूझा, कि उन्होनें नरेन् के आने पर उससे बात करना तो दूर, उसकी ओर देखा तक नहीं। स्वामी विवेकानंद थोडी देर बैठे रहे और प्रणाम करके चले गए। अगले दिन भी यही घटना दोहराई गई और अगले तीन-चार दिनों तक यही क्रम चलता रहा। अन्ततोगत्वा श्री रामकृष्ण परमहंस ने ही अपना मौन तोडा और स्वामी विवेकानंद से पूछा

"जब मैं तुझसे बात नहीं करता था तो तू यहां क्या करने आता रहा?"

प्रत्युत्तर में स्वामी विवेकानंद ने श्री रामकृष्ण परमहंस को ( जिन्हें वे 'महाराज' से सम्भोधित करते थे) कुछ आश्चर्य से देखा और सहज भाव से बोल पड़े-

"आपको क्या करना है, क्या नहीं करना है, वह तो महाराज आप ही जाने। मैं कोई आपसे बात करने थोड़े ही आता हूं... मैं तो बस आपको देखने आता हूं... "

... और गुरु को केवल देख-देख कर ही स्वामी विवेकानंद कहां पहुंच गए इसको स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं हैवास्तव में जिसे स्वामी विवेकानंद ने 'देखना' कहा वह निहारना था गुरुदेव कोजिसने गुरुदेव को 'निहारने' की कला सीख ली फिर उसे और कुछ करने की आवश्यकता ही कहां? दृष्टि भी एक पथ ही होती है जिस पर जब शिष्य अपने आग्रह के पुष्प बिखेर देता है तो गुरुदेव अत्यन्त प्रसन्नता से उस पथ पर अपने पग रखते हुए स्वयंमेव आकर शिष्य के ह्रदय में समा जाते है

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

शक्तिपात

गुरु गति पार लगावें

क्योंकि गुरु ही देते है तंत्र का ज्ञान

और माध्यम है

शक्तिपात

तंत्र कोई मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन आदि को नहीं कहते, अपितु सुव्यवस्थित (systematic) ढंग से किसी कार्य को सम्पादित करने की एक प्रणाली को तंत्र (system) कहते है। तंत्र की इस सुव्यवस्थित प्रणाली के अन्तर्गत शक्ति तत्व की अनिवार्यता को आरम्भ से ही श्रेष्ठ गुरुओं ने अनुभव किया, इसलिए दीक्षा जैसी क्रियाओं का वर्णन शास्त्रों में मिलता है -

दीक्षाग्निदग्धासौ मायाविच्छिन्नबन्धने ।
गतस्तय कर्मबन्ध निर्जीवस्तु शिवो भवेत् ॥

ज्ञान की परम्परा को अक्षुण्ण रखने के लिए शक्ति गुरुजनों के शिष्यों के अन्तः में ज्यों की त्यों स्थापित करने के लिए दीक्षा जैसी प्रक्रिया का प्रतिपादन किया, 'शक्तिपात' जैसी क्रिया को विकसित किया। शक्तिपात जैसी सुव्यवस्थित (तंत्रमय) क्रिया स्वतः ही प्रमाण है, इस बात कि शक्ति तत्व का कितना अधिक महत्त्व है तंत्र साधनाओं में।

'शक्तिपात' में गुरु अपनी शक्ति को साधक में स्थापित कर उसको शक्तिसंपन्न बना देते है, जिससे वह स्वयं साधनाओं के क्षेत्र में बढ़ कर सफल हो सके, वह प्राप्त कर सके जो उसका अभीष्ट है। आज भी जो श्रेष्ठ साधक है, वे योग्य गुरु से समय-समय पर शक्तिपात करते हुए तंत्र के क्षेत्र में, साधनाओं के क्षेत्र में एक-एक कदम आगे बढ़ते रहते है।

बिना दीक्षा के समस्त साधना कर्म व्यर्थ है, इसके कहने के पीछे मन्तव्य यहीं है, कि तंत्र में शक्ति की अनिवार्यता निर्विवाद है और 'शक्तिपात' तंत्र के शक्ति तत्व के महत्त्व को दर्शाता हुआ सुन्दरतम निरूपण है, जो आज भी पूज्यपाद गुरुदेव की परम्परा में मुमुक्षओं को उपलब्ध है।

- मंत्र-तंत्र-यंत्र पत्रिका, नवम्बर २००७