गुरुवार, 14 अगस्त 2008

शक्तिपात

गुरु गति पार लगावें

क्योंकि गुरु ही देते है तंत्र का ज्ञान

और माध्यम है

शक्तिपात

तंत्र कोई मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन आदि को नहीं कहते, अपितु सुव्यवस्थित (systematic) ढंग से किसी कार्य को सम्पादित करने की एक प्रणाली को तंत्र (system) कहते है। तंत्र की इस सुव्यवस्थित प्रणाली के अन्तर्गत शक्ति तत्व की अनिवार्यता को आरम्भ से ही श्रेष्ठ गुरुओं ने अनुभव किया, इसलिए दीक्षा जैसी क्रियाओं का वर्णन शास्त्रों में मिलता है -

दीक्षाग्निदग्धासौ मायाविच्छिन्नबन्धने ।
गतस्तय कर्मबन्ध निर्जीवस्तु शिवो भवेत् ॥

ज्ञान की परम्परा को अक्षुण्ण रखने के लिए शक्ति गुरुजनों के शिष्यों के अन्तः में ज्यों की त्यों स्थापित करने के लिए दीक्षा जैसी प्रक्रिया का प्रतिपादन किया, 'शक्तिपात' जैसी क्रिया को विकसित किया। शक्तिपात जैसी सुव्यवस्थित (तंत्रमय) क्रिया स्वतः ही प्रमाण है, इस बात कि शक्ति तत्व का कितना अधिक महत्त्व है तंत्र साधनाओं में।

'शक्तिपात' में गुरु अपनी शक्ति को साधक में स्थापित कर उसको शक्तिसंपन्न बना देते है, जिससे वह स्वयं साधनाओं के क्षेत्र में बढ़ कर सफल हो सके, वह प्राप्त कर सके जो उसका अभीष्ट है। आज भी जो श्रेष्ठ साधक है, वे योग्य गुरु से समय-समय पर शक्तिपात करते हुए तंत्र के क्षेत्र में, साधनाओं के क्षेत्र में एक-एक कदम आगे बढ़ते रहते है।

बिना दीक्षा के समस्त साधना कर्म व्यर्थ है, इसके कहने के पीछे मन्तव्य यहीं है, कि तंत्र में शक्ति की अनिवार्यता निर्विवाद है और 'शक्तिपात' तंत्र के शक्ति तत्व के महत्त्व को दर्शाता हुआ सुन्दरतम निरूपण है, जो आज भी पूज्यपाद गुरुदेव की परम्परा में मुमुक्षओं को उपलब्ध है।

- मंत्र-तंत्र-यंत्र पत्रिका, नवम्बर २००७

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