सोमवार, 16 जून 2008

कलश मांगलिकता का प्रतीक

पौराणिक ग्रंथों में कलश को ब्रह्मा, विष्णु, महेश और मात्रुगण का निवास बताया गया है। समुद्र मंथन के उपरांत कलश में अमृत की प्राप्ति हुई थी। ऐसा माना जाता है कि जगत्जननी सीताजी का आविर्भाव भी कलश से हुआ था। प्राचीन मंदिरों में कमल पुष्प पर विराजमान लक्ष्मी को दो हाथियों द्वारा अपने-अपने सूंड से जल कलश से स्नान कराने का दृश्य मिलता है। ऋग्वेद में कलश के विषय में कहा गया है -

आपूर्णो अव कलशः स्वाहा सेक्तेव कोशं षिषिचे पिब्ध्ये ।
समु प्रिया आवृवृत्रण मदाय प्रद्क्षिणिदभी सोमासं इन्द्रम ॥

अथर्ववेद में कहा गया है कि सूर्यदेव द्वारा दिए गए अमृत वरदान से मानव का शरीर कलश शत-शत वर्षों से जीवन रस धारा में प्रवाहित हो रहा है।

देवी पुराण में उल्लेख मिलता है कि भगवती देवी की पूजा अर्चना की शुरुआत करते समय सबसे पहले कलश की ही स्थापना की जाती है। नवरात्रि के अवसर पर देवी मंदिरों के साथ-साथ घरों में भी कलश स्थापित कर जगत जननी माता दुर्गा के शक्ति स्वरूपों की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। अतः भारतीय संस्कृति में कलश स्थापना अत्यंत धार्मिक और व्यावहारिक कर्म है।

- मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान पत्रिका, मार्च २००८

सोमवार, 9 जून 2008

मैं भक्तन को दास

एक संत थे जिनका नाम था जगन्नाथदास महाराज। वे भगवान को प्रीतिपूर्वक भजते थे। वे जब वृध्द हुए तो थोड़े बीमार पड़ने लगे। उनके मकान की उपरी मंजिल पर वे स्वयं और नीचे उनके शिष्य रहेते थे। रात को एक-दो बार बाबा को दस्त लग जाती थी, इसलिए "खट-खट" की आवाज करते तो कोई शिष्य आ जाता और उनका हाथ पकड़कर उन्हें शौचालय मै ले जाता। बाबा की सेवा करनेवाले वे शिष्य जवान लड़के थे।

एक रात बाबा ने खट-खटाया तो कोई आया नही। बाबा बोले "अरे, कोई आया नही ! बुढापा आ गया, प्रभु !"
इतने में एक युवक आया और बोला "बाबा ! मैं आपकी मदत करता हूं"

बाबा का हाथ पकड़कर वह उन्हें शौचालय मै ले गया। फिर हाथ-पैर घुलाकर बिस्तर पर लेटा दिया।
जगन्नाथदासजी बोले "यह कैसा सेवक है की इतनी जल्दी आ गया ! इसके स्पर्ष से आज अच्छा लग रहा है, आनंद-आनंद आ रहा है"।

जाते-जाते वह युवक लौटकर आ गया और बोला "बाबा! जब भी तुम्ह ऐसे 'खट-खट' करोगे न, तो मैं आ जाया करूंगा। तुम केवल विचार भी करोगे की 'वह आ जाए' तो मैं आ जाया करूँगा"

बाबा: "बेटा तुम्हे कैसे पता चलेगा?"
युवक: "मुझे पता चल जाता है"
बाबा: "अच्छा ! रात को सोता नही क्या?"
युवक: "हां, कभी सोता हूं, झपकी ले लेता हूं। मैं तो सदा सेवा मै रहता हूं"

जगन्नाथ महाराज रात को 'खट-खट' करते तो वह युवक झट आ जाता और बाबा की सेवा करता। ऐसा करते करते कई दिन बीत गए। जगन्नाथदासजी सोचते की 'यह लड़का सेवा करने तुरंत कैसे आ जाता है?'

एक दिन उन्होंने उस युवक का हाथ पकड़कर पूछा की "बेटा ! तेरा घर किधर है?"
युवक: "यही पास मै ही है। वैसे तो सब जगह है"
बाबा: "अरे ! ये तू क्या बोलता है, सब जगह तेरा घर है?"

बाबा की सुंदर समाज जगी। उनको शक होने लगा की 'हो न हो, यह तो अपनेवाला ही, जो किसीका बेटा नही लेकिन सबका बेटा बनने को तैयार है, बाप बनने को तैयार है, गुरु बनने को तैयार है, सखा बनने को तैयार है...'

बाबा ने कसकर युवक का हाथ पकड़ा और पूछा "सच बताओ, तुम कौन हो?"
युवक: "बाबा ! छोडिये, अभी मुजे कई जगह जाना है"
बाबा: "अरे ! कई जगह जाना है तो भले जाना, लेकिन तुम कौन हो यह तो बताओ"
युवक: "अच्छा बताता हूं"

देखते-देखते भगवन जगन्नाथ का दिव्य विग्रह प्रकट हो गया।

"देवधि देव ! सर्वलोके एकनाथ ! सभी लोकों के एकमात्र स्वामी ! आप मेरे लिए इतना कष्ट सहते थे ! रात्रि को आना, शौचालय ले जाना, हाथ-पैर धुलाना..प्रभु ! जब मेरा इतना ख्याल रख रहे थे तो मेरा रोग क्यो नही मिटा दिया ?"

तब मंद मुस्कुराते हुए भगवन बोले "महाराज ! तीन प्रकार के प्रारब्ध होते है: मंद, तीव्र, तर-तीव्र, मंद प्रारब्ध। सत्कर्म से, दान-पुण्य से भक्ति से मिट जाता है। तीव्र प्रारब्ध अपने पुरुषार्थ और भगवन के, संत महापुरुषों के आशीर्वाद से मिट जाता है। परन्तु तर-तीव्र प्रारब्ध तो मुझे भी भोगना पड़ता है। रामावतार मै मैंने बलि को छुपकर बाण मारा था तो कृष्णावतार में उसने व्याध बनकर मेरे पैर में बाण मारा।

तर-तीव्र प्रारब्ध सभीको भोगना पड़ता है। आपका रोग मिटाकर प्रारब्ध दबा दूँ, फिर क्या पता उसे भोगने के लिए आपको दूसरा जन्म लेना पड़े और तब कैसी स्तिथि हो जाय? इससे तो अच्छा है अभी पुरा हो जाय...और मुझे आपकी सेवा करने में किसी कष्ट का अनुभव नही होता, भक्त मेरे मुकुटमणि, मैं भक्तन का दास"

"प्रभु ! प्रभु ! प्रभु ! हे देव हे देव ! ॥" कहेते हुए जगन्नाथ दास महाराज भगवान के चरणों मै गिर पड़े और भावान्मधुर्य मै भाग्वात्शंती मै खो गए। भगवान अंतर्धान हो गए।

बुधवार, 4 जून 2008

जीवन का उद्देश्य

जीवन का एक उद्देश्य होता है, और वह यह कि उस ज्ञान को प्राप्त करें कि मेरा जन्म क्यों हुआ है? यह चिन्तन पशु-पक्षी, कीट पतंग में नहीं हो सकता। जन्म लेने कि क्रिया तो देवताओं में भी नहीं है। इसलिए मनुष्य जन्म को ब्रह्माण्ड की एक सर्वश्रेष्ठ क्रिया कहा गया है। परन्तु जन्म के पहले ही क्षण से तुम्हारी क्रिया श्मशान की ओर जाने की क्रिया हो जाती है। जैसे-जैसे एक-एक पल बीतता जाता है, तुम मृत्यु के और अधिक निकट होते जाते हो, और मृत्यु की यह क्रिया पशुओं में भी होती है।

परन्तु फिर तुममे और पशुओं में क्या अन्तर है? अन्तर यह है कि तुम इस रहस्य को ज्ञात कर सकते हो की प्रभु ने तुम्हे जीवन क्यों दिया है, जीवन का लक्ष्य क्या है? जीवन का लक्ष्य पूर्णता कि ओर अग्रसर होना है। और जो अपने जीवन में पूर्णता की ओर अग्रसर होने की क्रिया करता है, सोचता है, चिन्तन करता है, उसी का जीवन सार्थक है और यह सार्थकता तब हो सकती है, जब जीवन में पुण्यों का उदय हो ओर श्रेष्ठ गुरु मिल सकें।

और यदि जीवन में ऐसा कोई क्षण आए और हम गुरु को पहिचान लें, उनके चरणों को पकड़ लें - वह जीवन है। गुरु ने जन्म लिया है और जन्म लेकर पूर्णता प्राप्त की है, वे ही समझा सकते है, कि जीवन को कैसे पूर्णता दी जा सकती है।

जीवन के श्रेष्ठता तो आखों में, जीवन में रोम-रोम में और प्रत्येक अणु-अणु में एक आनंद, एक मस्ती एक हिलोर भर देना है, इसलिए मैं तुम्हे उस सागर में हिचकोले खाने की क्रिया सिखा रहा हूं जहां श्रेष्ठता है, जहां मस्ती है, जहां सुख है। और जीवन की इस यात्रा का प्रारम्भ जहां मनुष्य जन्म से है, वही अंत इष्ट से साक्षात्कार में है। यह रास्ता आनन्दप्रद है, यह रास्ता मधुरता का है, श्रेष्ठता का है। यह जीवन की प्रफुल्लता का है और सबसे बड़ी बात है की प्रेम के माध्यम से जीवन के अणु-अणु, जीवन के कण-कण और जीवन के रोम-रोम, जीवन के प्रत्येक कार्य में आनंद का अहसास आ जाता है, एक सुगंध और तरंग आ जाती है।
- सदगुरुदेव

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