शुक्रवार, 22 जून 2007

भारत का उत्थान तुम कर सकते हो- भाग ४

और भगवान शिव सती कि अधजली लाश को अपने कंधे पर ले कर क्रोध कि अवस्था में पुरे भारत वर्ष में घूमे क्रोध शांत नहीं हुआ। इतना बड़ा अपमान कि मेरी पत्नी जल गई और मैं कुछ नही कर पाया और क्रोध की चरम सीमा और उस चरम सीमा में दक्ष जैसे वरदान प्राप्त और तांत्रिक व्यक्ति का भी वध किया। ऐसे व्यक्ति का वध किया जाए तो कैसे किया जाए। तो उन्होने अपनी जटा में से बहुत उत्तेजना युक्त मंत्र के मध्यम से एक रचना कि जो कि पूर्ण जगदम्बा से भी सौ गुना ज्यादा क्षमतावान थी, जो साकार प्रतिमा थी जो कि सारी परेशानियों बाधाओं, अड़चन कठिनाइयों और शत्रुओं पर एकदम से प्रहार कर सके, समाप्त कर सके। वह चाहे शत्रु हो, चाहे बाधा हो, चाहे मुकदमेबाजी हो, चाहे असफलताएं हो, चाहे घर मे कलह हो - ये सब बाधाएं है। पैसे नही आ रहे है, व्यापार नहीं हो रहा हैं , ये सब बाधाएं है। ये समस्याएं हैं, परेशानीयां हैं अड़चनें हैं।

इनको समाप्त करने के लिए भगवान शिव ने एक रचना की जो की जगदम्बा से भी उंची, क्षमतावान थी। मुझसे भी उंचे गुरू हैं, मुझसे भू उंचे विद्वान होंगे। मैं यह कहकर जगदम्बा के प्रति न्यूनता नहीं दिखा रहा हूं। मगर भगवान शिव ने उस जटा में से ....

और जटा कैसी? भागीरथ ने जब गंगा का प्रवाह किया और उसे भगवान शिव ने अपनी जटा में लिया तो डेढ़ साल तक उन जटाओं मे गंगा घूमती रही, उसे बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं मिला। इतनी घनी जटा! भागीरथ ने प्रणाम किया किया- महाराज! अगर गंगा नदी आपकी जटाओं मे घूमती रही तो रास्ता मिलेगा ही नहीं उसको। इतनी घनीभूत जटा है। कृपा करके गंगा को धरती पर उतारे तो उन देवताओं और लोगों का कल्याण होगा।

और मंत्रों के माध्यम से उस देव गंगा को पृथ्वी पर उतारा। ऐसे विकराल, विध्वंसक महादेव! हमने उनका सौम्य रुप देखा है की आंखें बंद किए श्मशान में बैठे हुए हैं, सांप की मालाएं पहने हुए हैं, ऊपर से गंगा प्रवाहित हो रही है और ध्यानस्थ बैठे हैं।

आपने वह रुप देखा है क्रोधमय रुप नहीं देखा, ज्वालामय रुप नहीं देखा, आखों से बरसते अंगारे नहीं देखे। देखे इसलिये नहीं की किसी ने दिखाया नहीं आपको। महादेव इसलिये नहीं बने की शांत बैठे हैं..... आप हाइएस्ट पोस्ट पर पहुंचेंगे तो हाथ जोड़-जोड़ कर नहीं पहुंचेंगे, ज्ञान को गिडगिडाते हुए नही प्राप्त कर पाएंगे। आपमें ताक़त होगी, क्षमता होगी तो ऐसा कर पाएंगे।

और महादेव ने उस जटा से जिसको निकला उसे कृत्या कहते हैं। उस कृत्या ने दक्ष का सिर काट दिया वह तंत्र का उच्च कोटि का विद्वान था, दक्ष के समान कोई विद्वान नहीं था उसे सभी तंत्र का ज्ञान था जिसको यह वरदान था की तुम मर ही नहीं सकते। उस कृत्या ने एक क्षण में सिर काटकर बकरे का सिर लगाया दिया, उसके ऊपर और सारे ऋषि मुनियों को उखाड़-उखाड़ कर फ़ेंक दिया उस कृत्या ने। एक भी ऋषि योग्य नहीं था। सती जल रही थी और वे चुपचाप बैठ-बैठे देखते रहे।

भगवान् शिव उस क्रोध कि अवस्था में सती के शरीर को लेकर घूमते रहे। क्रोध में आदमी कुछ भी कर सकता है, और क्रोध होना ही चाहिऐ, क्रोध नहीं है तो मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। ऐसा नहीं हो कि शत्रु हमारे सामने खडे हो और हम गिडगिडाएं कि भईया तू मत कर ऐसा। ऐसा हो ही नहीं सकता। वह हाथ ऊपर उंचा करे उससे पहले सात झापड़ उसे पड़ जानी चाहिए। बाद में देखा जाएगा।

मैं तुम्हे गिडगीडाने वाला नहीं बनाना चाहता, मैं बना ही नहीं सकता। बन भी नहीं सकता, जब मैं खुद बना ही नहीं तो तुम्हे कैसे बनाउंगा। पहले हाथ उठाऊंगा नहीं, और हाथ उसका उठा और मेरे गाल तक पहुंचे उससे पहले छः थप्पड़ मार कर निचे गिरा दूंगा, आज भी इतनी ताक़त क्षमता रखता हूँ, आज से सौ साल बाद भी इतनी ही ताक़त, क्षमता रखूंगा आपके सामने।

उस कृत्या ने समस्त ऋषि मुनियों को लात मार मारकर फ़ेंक दिया। आज हम उनको ऋषि कहते हैं, उस समय तो वे मनुष्य थे आप जैसे। आप भी ऋषि हैं मगर आप गलत काम करेंगे त लात मारकर फेकेंगे ही। भगवान् शिव ने कहा - यह तुमने क्या किया? यह यज्ञ कर रहे थे तुम एक औरत उसमें जल गई और आप बैठे-बैठे रह गए? तुममे दक्ष को समझाने कि क्षमता नहीं रह गई।

और भगवान शिव उस क्रोध कि अवस्था मे उस सती के शव को कंधे पर रख कर जहां-जहां पुरे भारत वर्ष मे घूमे, जहां-जहां गल गल कर जो अंग गिरा वह शक्तिपीठ कहलाए। और ५२ स्थानों पर वह शरीर गिरा, हाथ कही गिरा, कहीँ सिर गिरा, कहीँ पांव गिरा, कहीँ और कोई आंग गिरा। जीतनी चीजें गिरी ५२ जगहों पर गिरी और वे शक्ति पीठ कहलाए।

आज भारतवर्ष में कहते हैं शक्ति के जो अंग गिरे, वहां जो पीठ बनी, चेतना बनी, मंत्र बने, स्थान बने वे शक्ति पीठ कहलाए। मैं बात यह कह रहा था कि इतने ऋषियों, मुनियों को इतने उच्चकोटि के ज्ञान को, इतने तंत्र के विद्वानों को जो अपनी ठोकरों से मार दे और विध्वंस कर दे। सब कुछ वह क्या चीज थी - वह कृत्या थी और कृत्या से वैताल पैदा हुआ। वैताल जिसने विक्रमादित्य के काल में एक अदभूत, अनिर्वचनीय कथन किया कि कोई भी काम जिंदगी में असफ़ल नहीं हो सकता, संभव ही नहीं है। बम तो एक बहूत मामूली चीज है बम का प्रहार हमारा कुछ नहीं बिगाड सकता। हमें पहले ही मालूम पड़ जायेगा कि यह आदमी बम फेंकने वाला है, हम पहले ही उसका संहार कर देंगे, समाप्त कर देंगे, अगर कृत्या हमारे पास सिद्ध होगी तो।

और हमारे पास इंटैलीजैंस है, हमारे पास पुलिस है हमारे पास राँ है, हमारे पास और भी है, फिर भी बम विस्फोट होते जा रहे हैं। लाखों लोग मरते जा रहे है, बेकसूर लोग मरते जा रहे हैं। जिन्होंने कोई नुकसान किया ही नहीं बेचारों ने। आप सोचिए कि घर मे एक मृत्यु हो जाए तो घर कि क्या हालत होती है। एक जवान बेटा मर जाए तो पुरा जीवन दुःखदायी हो जाता है। यहां तो घर के पांच-पांच लोग मर जाते है और कानों पर जूं नहीं रेंगती। भारत सरकार कोशिश कर रही है इसमे कोई दो राय नहीं है, पुरा प्रयत्न कर रही है इसमे भी दो राय नहीं है मगर प्रहारक इतने बन गए है कि इस समय विज्ञान कुछ नहीं कर पा रहा है।

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