गुरुवार, 24 सितंबर 2009

शंकराचार्य विचारित - लक्ष्योत्तमा साधना

आदिगुरू शंकराचार्य के सम्बन्ध में हजारों कथाएं हैं उनमें से कुछ कथाएं उनके शिष्यों, भक्तों के अनुभव के आधार पर रचित की गई। इन सब कथाओं के सार में एक बात पूर्ण रूप से स्पष्ट होती है कि शंकराचार्य ने अपनी जीवन यात्रा में योगियों, यतियों और सन्यासियों से ज्ञान ग्रहण किया। ओंकारेश्वर में अपने गुरु गोविन्द्पादाचार्यसे दीक्षा प्राप्त कर उनके आर्शीवाद से आगे की यात्रा को निकल पड़े। धन के नाम भिक्षा का खाली झोला सा लेकिन दिमाग साधनाओं, मंत्र-तंत्र से भरपूर। उन्होनें अपने जीवन यात्रा में एक गरीब ब्राह्मणी के घर साधना प्रयोग कर धन प्रदान (जिसे कालांतर में धन वर्षा कहा गया) किया और आगे की यात्रा में निकल पड़े थे।

इसके मूल में अनेक रहस्य उदघाटित होते होते है, संभवतः उन सबका विवेचन करना तो सम्भव नहीं हैं, परन्तु मूल विषय है, कि क्या स्तुति के माध्यम से धनवर्षा सम्भव है या शंकराचार्य ने किस मार्ग को अपनाया, कि वे लक्ष्मी को आबद्ध कर इच्छित स्थान पर धनवर्षा कराने में सक्षम हो सके?

इस प्रश्न का उत्तर यहीं है, कि मात्र स्तुति के माध्यम से लक्ष्मी आबद्ध करना सम्भव नहीं है, यदि स्तुति के माध्यम से लक्ष्मी आबद्ध की जा सकती है, तो प्रत्येक गृहस्थ व्यक्ति के घर वह व्यक्ति, जो नित्य अपने व्यवसाय स्थल पर जाकर लक्ष्मी की स्तुति करता है, उनके घरों में अब तक तो धन का ढेर लग जाना चाहिए था।

... परन्तु ऐसा प्रायः सम्भव नहीं होता, कोई भी व्यक्ति, जो स्तुति करता है, उसके घर धन की वर्षा नहीं होती, उनके घरों में धन का ढेर नहीं लगता; वे अपने पुरे जीवन में लक्ष्मी की स्तुति तो करते है, फिर भी कर्जदार ही बने रहते है, धन का उन्हें कोई अजस्त्र स्रोत नहीं मिलता, अतः स्पष्टतः शंकराचार्य ने अवश्य ही कोई ऐसा प्रयोग संपन्न किया होगा, जिसके माध्यम से वे लक्ष्मी को आबद्ध कर सकने में समर्थ हुए।

'तंत्र' एकमात्र ऐसा माध्यम है, जिसमें अनेक विद्याएं, अनेक ऐसे प्रयोग हैं, जिनका ज्ञान यदि व्यक्ति प्राप्त कर लेता है तो उसके माध्यम से वह किसी भी देवी-देवता को आबद्ध करने में समर्थ हो सकता है।

शंकराचार्य तो तंत्र के उच्चकोटि के ज्ञाता थे, उन्होनें ही बौद्ध धर्म को सम्पूर्ण भारतवर्ष से विस्थापित कर पुनः हिंदुत्व की स्थापना कि। तंत्र ही वह सबल माध्यम था, जिसके द्वारा शंकराचार्य कम उम्र में ही अपने लक्ष्य की पूर्णता प्राप्त सके। वास्तव में देखा जाय, तो शंकराचार्य का जीवन अनेक रहस्यों से ओत-प्रोत है, जिसकी विवेचना करना, अनेक गोपनीय रहस्यों को उजागर करना ही होगा।

शंकराचार्य के जीवन का गोपनीय तत्थ्य ही है, कि संन्यासी होते हुए भी, संन्यास धर्म का पालन करते हुए भी किसी के समक्ष याचना नहीं की, वरन स्वयं तो समर्थ हुए ही, साथ ही सब कुछ प्रदान करने में सक्षम भी हुए।

जब शंकराचार्य ने देखा, कि समाज कि व्यवस्था में असंतुलन आ जाने के कारण उच्चकोटि की आध्यात्मिक विभूतियाँ भी भीक्षा मांग कर जीवन मांग कर जीवन यापन करने पर विश्वास करने लगी है एवं साधनों का महत्त्व न्यूनतर होता जा रहा है, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि कर्मक्षेत्र एवं साधनापक्ष को छोड़कर भिक्षावृत्ति में विश्वास करने लगे हैं, तब शंकराचार्य को इन सभी परिस्थितियों से बहुत ग्लानी हुई। वे चाहते, कि भारतवर्ष का कोई भी व्यक्ति भूखा, गरीब लाचार, बीमार तथा ज्ञान के अभाव में न जिये; जिये तो पौरूषता का जीवन जिये, श्रेष्ठता का जीवन जिये।

... और तब उन्होनें अथक परिश्रम एवं खोजबीन के पश्चात अत्यन्त दुर्लभ अवं गोपनीय प्रयोगों का अन्वेषण किया। इन प्रयोगों को स्वयं सिद्ध कर दिखा दिया, कि एक सन्यासी भी सभी दृष्टियों से पूर्णता युक्त जीवन जी सकता है, एक गरीब से गरीब व्यक्ति भी साधना के माध्यम से आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त कर सकता है ... और यह सिद्ध किया एक ब्राह्मणी के घर में इस प्रयोग के माध्यम से धन वर्षा करवा कर ... जिससे उस समय के लोग तो आचम्भित हुए बिना नहीं रह सके।

व्यक्ति के जीवन में इतनी आधिक विषमताएं उत्पन्न हो चुकी है, कि उसे समाज में प्रतिष्ठित व् सम्मानित होने कल लिए होने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है, बिना धन के तो वह समाज में अपनी प्रतिष्ठा व् सम्मान स्थापित कर ही नहीं सकता।

आज छोटी-छोटी वस्तु की भी यदि आवश्यकता होती है, तो बिना धन के हम उसे खरीद नहीं सकते, ललचायी नजरों से दूसरों की और ताकेंगे या किसी अन्य माध्यम से उसे प्राप्त करने का प्रयास करेंगे, क्योंकि वस्तु की आवश्यकता हमें यह सब करने पर मजबूर करेगी, परन्तु यह नैतिकता के और समाज के नियमों के विपरीत है।

ऐसी दशा में यह आवश्यक हो गया है, कि हम साधना के महत्त्व को समझें। हम सभी अपने जीवन में साधनाओं को स्थान दे और अपनी हर आवश्यकता की पूर्ति का हेतु साधनाओं को बनाएं।

शंकराचार्य कृत विविध प्रयोगों में एक प्रयोग 'लक्ष्योत्तमा प्रयोग' भी है, जो धन वर्षा कराने में सक्षम है। यह अपने आपमें अद्वितीय प्रयोग है। यह साधना अत्यन्त सरल, सटीक तथा शीघ्र प्रभाव देने वाली कही गई है। यदि यह प्रयोग पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा, विश्वास एवं पूर्ण प्रामाणिक सामग्री तथा विधि-विधान के साथ किया जाय, तो अवश्य ही सफलता प्राप्त होती है।

यह प्रयोग तब अब तक गोपनीय ही रहा है, किंतु पत्रिका के उद्देश्य को ध्यान में रखकर साधकों के समक्ष उच्चकोटि की इस साधना को पत्रिका के इन पन्नों पर जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं -

साधना विधान
  • इस साधना में आवश्यक है सामग्री है - 'लक्ष्म्योत्तमा यंत्र' तथा कमलगट्टे की माला ।
  • यह रात्रिकालीन साधना है और २१ दिनों तक नियमित रूप से की जाती है। साधना काल में एक समय सात्विक भोजन करें व् ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • इस साधना को आप पूर्णिमा से या किसी भी रविवार से प्रारम्भ कर सकते हें।
  • साधक सफेद रंग की धोती पहने तथा स्नान आदि कर रात्री के १० बजे के बाद साधना प्रारम्भ करें।
  • लकडी के बाजोट पर लाल रंग का वस्त्र बिछा लें उस पर एक ताम्र पात्र में केसर से 'श्री' बीज अंकित कर, उस पर यंत्र स्थापित कर यंत्र का पूजन करें।
  • बाजोट पर दाहिनी ओर चावलों की ढेरी बनाकर कमलगट्टे की माला को स्थापित कर पुष्प, कुंकुम तथा अक्षत से संक्षिप्त पूजन करें।
  • घी का दीपक तथा धुप लगाकर उनका अक्षत तथा कुंकुम से पूजन करें।
  • देवी का ध्यान करें -

अरुणकमलसंस्था तद्रजः पुंजवर्णा,
करकमल ध्रुतेष्टामितिमाम्बुजाता ।
मणिमुकुट विचित्रालंकृता कल्पजालै;
सकल भुवंमाता सततं श्रीः श्रीयै नमः ॥

  • कमलगट्टे की माला से नित्य २१ माला निम्न मंत्र का जप करें -

ॐ श्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै श्रीं श्रीं ॐ नमः

  • साधना समाप्त होने पर अगले दिन यंत्र माला को बाजोट पर बिछे लाल रंग के कपड़े में बांध कर नदी में प्रवाहित कर दें।

-मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान पत्रिका, सितम्बर 2009

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