रविवार, 4 मई 2008

श्रद्धा - सिद्धि की कुंजी

एक बार एक ऋषि समुद्र के किनारे खड़े सूरज की भव्यता देख रहे थे। वे एक पेड़ के नीचे शांत वातावरण में खड़े थे। समुद्र की ओर से ठंडी, ताजगी भरी हवा चल रही थी और उसके साथ वृक्षों के उपरी भाग-हल्के झूम रहे थे, बहुत दूर नीले पर्वतों पर बादल छाये हुए थे।

वहां उनके पास जिज्ञासापूर्ण दृष्टी लेकर एक शिष्य आया। उसकी ओर देखते हुए ऋषि ने पूछा, "वत्स, तुम्हें क्या बात विचलित कर रही है?"

शिष्य बोला, गुरु जी, बात यह कि आप जिस प्रकार भूमि पर चलते हैं, उसी प्रकार सरलता से पानी कि सतह पर चल सकते हैं? किंतु हम जब पानी में जाते हैं तो छटपटाते हैं, और डूबने लगते हैं।"

गुरुदेव बोले, "जिसके दिल में श्रद्धा है और जिसकी आंखों में निष्ठा का प्रकाश है - वह मछियारे कि नाव कि भांति आराम से पानी पर चल सकता हैं।"

शिष्य बोला, "स्वामी जी, जब से मैंने आपको देखा हैं, मुझमें आपके लिये हमेशा निष्ठा रही है, मैं भी आपकी तरह आस्थापूर्ण हूं और मेरी श्रद्धा मुझे विश्वास पूर्ण बनाती है।"

ऋषि बोले, "तब मेरे साथ आओ और हम मिल कर पानी पर चलते हैं।" शिष्य उनके पीछे-पीछे चल पडा। दोनों गुरु-शिष्य पानी पर चलने लगे। अचानक एक विशाल लहर उठी। ऋषि तो उस लहर पर चलने लगे, किंतु शिष्य डूबने लगा। ऋषि ने पुकारा, "वत्स तुम्हें क्या हुआ है?"

उत्तर देते हुए शिष्य कि आवाज में भय था, "गुरुदेव, जब मैंने उस विशाल लहर को अपनी ओर आते देखा, तो लगा वह मुझे निगल जायेगी। मेरे दिल में डर पैदा हुआ और मैं डूबने लगा। मेरे प्रिय गुरुदेव, मुझे बचा लीजिये, नहीं तो मैं डूब जाऊंगा।"

और ऋषि बोले, "अफसोस! मेरे बच्चे, तुम ने लहरों को तो देखा और उनसे डर गए, किंतु तुमने लहरों के स्वामी को नहीं देखा जो सदा तुम्हारी सहायता के लिये तत्पर है।"
- मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान पत्रिका, फरवरी २००८

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