रविवार, 2 मार्च 2008

श्राद्ध और पितरेश्वर तर्पण

मातृ पितृ चरण कमलेभ्यो नमः
सर्व पितरेश्वर चरण कमलेभ्यो नमः

प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता,पूर्वजों को नमस्कार प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है, हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं, इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं।
इसलिए हमारे ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध,तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं। यदि कोई कारण से उनकी आत्मा को मुक्ति प्रदान नहीं हुई है तो हम उनकी शांति के लिए विशिष्ट कर्म करते है इसीलिए आवश्यक है -

श्राद्ध
और
पितरेश्वर तर्पण मुक्ति विधान-साधना
पितरेश्वर दोष निवारण विधान-साधना


श्राद्ध का अर्थ है - श्रद्धापूर्वक कुछ देना या स्वयं को विनम्रतापूर्वक श्रद्धज्ञ व्यक्त करना। अपने मृत पूर्वजों के लिए कृतज्ञता ज्ञापन करना ही श्राद्ध है, क्योंकि भारतीय मान्यता के अनुसार मृत जीवात्मा विभिन्न लोकों में भटकती हुई दुःखदायी योनियों में प्रविष्ट होती है, तथा अनन्त दुःखों को भोगती है... । शास्त्रीय परम्परानुसार श्राद्ध के माध्यम से दिवंगत आत्मा को शान्ति प्राप्त होती है।

पितरेश्वर का सामान्य अर्थ यह माना गया है की व्यक्ति विशेष के वे पूर्वज जिन्होंने इस संसार को त्याग दिया है लेकिन प्रेत शब्द का भी अपभ्रंश पितर है अर्थात वे आत्माएं जिन्हें मुक्ति नहीं मिलाती। वे आत्माएं प्रेत योनी में होने के कारण सामान्य भाषा में पितृ अवश्य कहा जाता है लेकिन यह आवश्यक नहीं की इन पितरों का अथवा प्रेतों का आपसे कोई सीधा सम्बन्ध हो। ये प्रेत आत्माएं किसी भी बालक स्त्री, कमजोर व्यक्ति पर अधिकार जमा सकती है। जिसके चलते मरणांतक पीडा होती है। ऐसी प्रेत बाधा से मुक्ति पितृ-पक्ष में, श्राद्ध पक्ष में इस लेख में दी गई है।


परिवार की शुभचिन्तक आत्माएं: भोग अथवा लालसा के कारण आत्मा की मुक्ति नहीं हो पाती है और इसी कारण जब तक कोई नया शरीर न मिले तब तक भटकते रहना एक प्रकार से उसकी विवशता होती है। परन्तु कई बार आत्मा की मुक्ति अपने पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति के कारण भी नहीं हो पाती है। ऐसे कई कारण हो सकते है, जैसे उसने अपनी वसीयत कहीं गुप्त रूप से रख दी हो अथवा धन संचय कर कहीं छिपा दिया हो और अपने परिवार जनों को देना चाहता हो। ये भी हो सकता है, की परिवार जनों के ऊपर कोई विपत्ति आने वाली हो अथवा पुत्री का विवाह जहां तय किया जा रहा हों वह परिवार ठीक न हो, आदि बातों को अपने परिवार जनों को बताना चाहती है। इस दशा में रहकर उस मृतात्मा को जब तक की इन बातों को अपने परिवार जनों से नही कह देती तब तक वह निरंतर एक दबाव में रहती है, उसकी मुक्ति नहीं हो पाती, इसलिए अपनी परिचित मृतात्माओं से सम्पर्क साधक के लिए सदैव कल्याणकारी होता है। पितरों के आशीर्वाद प्राप्ति हेतु पितरेश्वर साधना का इसलिए भारतीय चिन्तन में प्रावधान है।

सृष्टि का क्रम जिस प्रकार निर्धारित समयानुसार संपन्न होता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य के निर्धारण भी विभिन्न निश्चित कर्मों से गुजरता हुआ जन्म से मृत्यु और पुंसवन से जन्म की ओर गतिशील होता है।

विश्वनियन्ता के इस निर्धारित क्रम के अनुसार ही हमारे ऋषियों-महर्षियों ने सम्पूर्ण मानव-जीवन को अर्थात गर्भ में आगमन से लेकर जन्म और मृत्यु तक, पूर्ण कालचक्र को विभिन्न खंडों में विभाजित कर दिया है। उन्होंने ऐसा इसलिए किया, जिससे मनुष्य एक अनुशासित और सुव्यवस्थित तरीके से अपने जीवन को व्यतीत करे और साथ ही प्रत्येक कार्य के साथ, वे कार्य, जो मानव-जीवन को प्राप्त करने और सुरक्षित रखने के दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वूर्ण होते है, उनके हेतु परम पिता परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर, उनकी प्रसन्नता और आशीर्वाद प्राप्त कर सके।

सनातन धर्म में इस निर्धारित कार्य को 'संस्कार' के नाम से संबोधित किया गया है। बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं ये संस्कार योग्य पुत्र अथवा पुत्री की प्राप्ति हेतु। गर्भ में आगमन के समय 'पुंसवन संस्कार' सम्पन्न किया जाता है, तो जन्म लेने के उपरांत 'नामकरण', 'चूडामणि संस्कार' संपन्न किया जाता है, अर्थात पांच से पन्द्रह वर्ष की अवस्था तक उसका 'उपनयन संस्कार' कर, उसे द्वीज बनाकर पूर्ण विद्यार्जन का अधिकार प्रदान किया जाता है।

यौवन का पदार्पण होने पर 'विवाह संस्कार' किया जाता है और इस प्रकार विभिन्न संस्कारों से गुजरता हुआ व्यक्ति जब वृद्धावस्था को प्राप्त कर अपने जर्जर और रोगग्रस्त शरीर का त्याग कर किसी अन्य शरीर को धारण करने के लिए प्रस्थान करता है, तो उसके द्वारा त्यागे गए शरीर को हिंदू धर्मानुसार अग्नि में समर्पित कर 'कपाल क्रिया संस्कार' सम्पन्न किया जाता है।

अत्यधिक व्यवस्थित है हमारी सनातन धर्म की संस्कृति और अत्यधिक उदार व सहृदय भी। मृत्यु के बाद भी हमारा रिश्ता उस हुतात्मा से जुडा रहता है, समाप्त नहीं होता और उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए ही बनाया गया है 'श्राद्ध' नामक संस्कार।
श्राद्ध का महत्त्व सर्वविदित है। इसके बारे में कोई आवश्यक नहीं है की विस्तृत विवेचना की जाय, किन्तु यह बहुत ही कम लोगों को ज्ञात होगा, की श्राद्ध बारह प्रकार के होते है: -
  1. नित्य श्राद्ध - जो श्राद्ध प्रतिदिन किया जाय, वह नित्य श्राद्ध है। तिल, धान्य, जल, दूध, फल, मूल, शाक आदि से पितरों की संतुष्टि के लिए प्रतिदिन श्राद्ध करना चाहिए।

  2. नैमित्तिक-श्राद्ध - 'एकोद्दिष्ट-श्राद्ध' के नाम से भी इसे जाना जाता है। इसे विधिपूर्वक सम्पन्न कर विषम संख्या में ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

  3. काम्य-श्राद्ध - जो श्राद्ध कामना युक्त होता है, उसे काम्य श्राद्ध कहते है।

  4. वृद्धि-श्राद्ध - यह श्राद्ध धन-धान्य तथा वंश-वृद्धि के लिए किया जाता है, इसे उपनयन संस्कार सम्पन्न व्यक्ति को ही करना चाहिए।

  5. सपिन्डन श्राद्ध - इस श्राद्ध को सम्पन्न करने के लिए चार शुद्ध पत्र लेकर उनमे गंध, जल और तिल मिला कर रखा जाता है, फिर प्रेत पात्र का जल पितृ पात्र में छोडा जाता है। चारों पात्र प्रतीक होते है - प्रेतात्मा, पितृत्मा, देवात्मा और उन अज्ञात आत्माओं के, जिनके बारे में हमे ज्ञान नही है।

  6. पार्वण श्राद्ध - अमावास्या अथवा किसी पर्व विशेष पर किया गया श्राद्ध पार्वण-श्राद्ध कहलाता है।

  7. गोष्ठ-श्राद्ध - गौओं कर्मांग गर्भादान सिमान्तोय जाने वाला श्राद्ध कर्म गोष्ठ-श्राद्ध कहलाता है।

  8. शुद्धयर्थ-श्राद्ध - विद्वानों की संतुष्टि, पितरों की तृप्ति, सुख-संपत्ति की प्राप्ति के निमित्त ब्राहमणों द्वारा कराया जाने वाला कर्म शुद्धयर्थ-श्राद्ध है

  9. कर्मांग-श्राद्ध - यह श्राद्ध गर्भाधान, सिमान्तोन्नयन तथा पुंसवन संस्कार के समय सम्पन्न होता है।

  10. दैविक-श्राद्ध - देवाताओं के निमित्त घी से किया गया हवानादी कार्य, जो यात्रादी के दिन संपन्न किया जाता है, उसे दैविक-श्राद्ध कहते है।
  11. औपचारिक-श्राद्ध - यह श्राद्ध शरीर की वृद्धि और पुष्टि के लिए किया जाता है।
  12. सांवत्सरिक-श्राद्ध - यह श्राद्ध सभी श्राद्धों में श्रेष्ठ कहलाता है, और इसे मृत व्यक्ति की पुण्य तिथि पर सम्पन्न किया जाता है। इसके महत्त्व का आभास 'भविष्य पुराण' में वर्णित इस बात से हो जाता है, जब भगवान सूर्य स्वयं कहते है - 'जो व्यक्ति सांवत्सरिक-श्राद्ध नहीं करता है, उसकी पूजा न तो मै स्वीकार करता हूं न ही विष्णु, ब्रम्हा, रुद्र और अन्य देवगण ही ग्रहण करते है।' अतः व्यक्ति को पर्यंत करके प्रति वर्ष मृत व्यक्ति की पुण्य तिथि पर इस श्राद्ध को सम्पन्न करना ही चाहिए।

जो व्यक्ति माता-पिता का वार्षिक श्राद्ध नहीं करता है, उसे घोर नरक की प्राप्ति होती है, और अंत में उसका जन्म 'सूकर योनी' में होता है। श्राद्ध पक्ष में व्यक्ति को अपने घर में निर्धारित तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म सम्पन्न करना ही चाहिए।

कुछ व्यक्तियों के सम्मुख यह प्रश्न होगा कि उन्हें अपने माता पिता की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, तो वे किस दिन श्राद्ध सम्पन्न करें?
- ऐसे व्यक्ति को श्राद्ध पक्ष की अमावास्या को श्राद्ध कर्म सम्पन्न करना चाहिए। सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध यथा - मां, दादी, परदादी आदि का श्राद्ध मातृ नवमी को करना चाहिए।

श्राद्ध कर्म केवल मृत माता-पिता के लिए ही सम्पन्न किया जाता है, ऐसी बात नहीं है, यह कर्म तो मृत पूर्वजों के प्रति आदर का सूचक है, और उनके आशीर्वाद को प्राप्त कराने का सुअवसर है, अतः श्राद्ध कर्म प्रत्येक साधक और पाठक को सम्पन्न करना ही चाहिए।

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