शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2008

हमे तो सदगुरु से यही प्रार्थना करनी चाहिऐ

सदगुरु तुम्हारी रीत है निराली,
सजदा किया मिल गयी प्रेम-प्याली

प्रभु, मेरे गुरुदेव! मै यह भूलूं नहीं, कि तुम सदैव मेरे ह्रदय में निवास करते हो, तुम्हीं मेरे जीवन के सूत्रधार हो। इस क्षण-क्षण बदलने वाले, पल-पल बनने-मिटने वाले संसार में जो कुछ भी हो रहा है, जो कुछ भी सामने आ रहा है, जो कुछ भी हिल-डुल रहा है और फिर आंखों से ओझल हो रहा है, वह सारा ही तुम्हारी सत्ता से अनुप्राणित है, स्पन्दित है। मेरा मन-प्राण तुम में ही निवास करे और मेरा ऐसा ही ज्ञान, ऐसी ही चेतना बनी रहे कि तुम्हारी इच्छा के सिवा मेरी कोई इच्छा नहीं, कोई गति नहीं, कोई चिन्तन नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई शरण नहीं, कोई अस्तित्व नहीं। यह शरीर तो मृत पिंड है, यह सजीव इसलिए दिखाई दे रहा है कि तुम इसमे बसे हुए हो।

ओ मेरे गुरुवर, मेरे प्राणाधार! मैं अपने ह्रदय में सतत तुम्हारा आलिंगन-रस पान करता रहूं, जो कुछ करूं तुम्हारी प्रेरणा और संकेत से। तुम्ही मेरे द्वारा अपना-कार्य करो, मेरे ह्रदय में तुम्हारा ही प्रेम विराजे, तुम्ही प्रेम रूप में विराजो। मेरी बुद्धि में तुम्हीं प्रकाश रूप में बने रहो, मेरे मस्तिष्क में तुम्हीं विचार रूप में रहो, मेरे समस्त अंहकार को अपने में डूबा लो, प्रभु मेरे अन्दर तुम्हारे सिवा कुछ भी रह न जाय, तुम्हीं - तुम रम जाओ।

हे सर्व समर्थ स्वामिन। आपकी कृपा से मैं कहीं भी पहुंच जाऊं, तुम से एकाकार होकर तुम्हारी ही तरह हो जाऊं, परन्तु भूलकर भी मैं यह न मान बैठू कि मैं तुम्हारे सदृश हूं। मैं हूं ही क्या? एक तुच्छ, नगण्य, नाचीज, जो अपनी एक-एक सांस के लिए तुम्हारी कृपा पर अवलंबित है। तुम्हारे अनन्त महासागर के सम्मुख इस कण कि क्या हस्ती है?

प्रभु! मेरा अंहकार तुम ले लो, हे श्रद्धेय, दयामय गुरुवर! मुझे नम्रता, सौम्यता प्रदान करों। तुम्हारी इच्छा मेरे जीवन में पूर्ण हो, तुम्हारी जो इच्छा हो, वही मेरे भीतर-बाहर हो। तुम्ही मेरी साधना हो, तुम्हीं मेरे भीतर सिद्ध होकर अपनी इच्छा पूर्ण करो।

हे नाथ! इस त्रिताप-संन्तप्त संसार में मुझे रखा ही है तो मुझे मेरा मनोवांछित जीवन प्रदान करो। ऐसा हो मेरा जीवन -

बुद्धेनाष्ठ लीना नतेन शिरसा गात्रं सरोमोदगमैः।
काठिन्येन सगददेन नयनोदगीर्णेन वांष्पाम्बुना॥
नित्यं त्वाच्चरणारविन्द्र युगलम ध्यानामृता स्वदिना।
अस्माकं सरसिरुहाक्षम सततं सम्पद हिमम जीवितं॥

हे गुरुदेव। मेरे दोनों हाथ बंधे हुए हो, मस्तक झुका हुआ हो और सारे शरीर में रोमाञ्च हो रहा हो, अंग-प्रत्यंग पुलकित हो रहा हो, मैं आपके चरणों में पूर्ण समर्पित होकर गद-गद कंठ से पार्थना करता रहूं और नेत्रों से आसुओं कि वर्षा हो रही हो। तुम्हारे युगल चरण-कमलों के ध्यानामृत का नित्य ही पान करता रहूं। गुरुवर मेरी यही एकमात्र प्रार्थना है। ऐसा जीवन मुझे सतत प्रदान करो।

मैंने आकर संसार में धर्म अपना निभाया है,
इसी डगर पे चलकर अब मंजिल पाना है तुम्हे।
मैंने जला दी ज्ञान कि चिंगारी अब तेरे अन्दर
इस चिंगारी को शोला बनाना है तुम्हे।

गुरु वचन

मैंने दे दिया तुझको वह दीप जो मेरे पास था,
इस दीप को हर दिल में जलाना है तुम्हे।
मेरे पास जो भी है उस पर हक है तुम्हारा,
मैं बाहें फैलाये खडा हूं, आवाज दे रहा हूं तुम्हें।
हमेशा नहीं कह पाउँगा ये बाते जो कहानी थी तुम्हे।

गुरु वचन

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैं गुरूजी का सनिद्य कैसे प्राप्त कर सकता हू , कृपया मुझे एस बारे में बताये
    मेरा इ-मेल है karan_mishras@yahoo.co.in

    उत्तर देंहटाएं

मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान - Headline Animator