रविवार, 20 जनवरी 2008

यदि हमें अवसर मिलता

यह वाक्य अक्सर लोगों के द्वारा सुनने को मिल जाता है

वे कहते हैं -

यदि हमें अवसर मिला होता, तो आज हम यह कर लेते, आज हम वह बन जाते, आज हमारी यह स्थिति नहीं होती। तुम क्या जानो, मुझमें कितनी योग्यता है, कितनी क्षमता है, लेकिन दुर्भाग्य से हमें अवसर ही नहीं प्राप्त हो पाया।

यथार्थ में देखा जाय, तो यह कहना उचित और न्यायसंगत नहीं है। इन वाक्यों के द्वारा हम केवल अपनी अकर्मण्यता को छिपाने का प्रयास ही करते हैं, अपनी कायरता को छिपाने के लिए ढाल के रुप में ही इन शब्दों का प्रयोग करते हैं। अवसर तो सदैव से हमारे जीवन में आते ही रहते है, लेकिन हम उन्हें पहिचान नहीं पाते, उनका उपयोग नहीं कर पाते और बाद में पश्चाताप करते रहते है, अपने दोष दूसरों पर मढ़ते रहते हैं।

इसका मूल कारण यही है, कि हम अपने ऋषियों कि, अपने पूर्वजों कि गौरवशाली परम्पराओं को भूल कर अंधी भौतिकता कि दौड़ में उलझ रहे, वासनात्मक जगत में लिप्त रहे। हमने अपनी प्राचीन विद्याओं को जानने और जीवन में उतारने का प्रयत्न ही नहीं किया। फलत: हम उस पौरुष से अनाभिज्ञ रहे, जिसके द्वारा विश्वामित्र ने लक्ष्मी को अपने घर में कैद कर दिया था, एक नयी सृष्टि का निर्माण प्रारंभ कर दियां था, जिसके बल पर शंकराचार्य ने एक गरीब ब्राह्मणी के घर स्वर्ण वर्षा करा दी थी इन शब्दों को कहना हमारी लिजलिजी मानसिकता का ही प्रतीक है।

सम्पूर्ण जीवन को इस मानसिकता से मुक्त करने का एक छोटा सा प्रयास मन्त्र-तंत्र-यंत्र पत्रिका अपने पन्नों के माध्यम से सम्पन्न कर रही है, जिससे कि हम स्वशक्ति से युक्त हो सकें, हम स्वयं अपने भाग्य का निर्माण कर सकें और अपने महान ऋषियों के गौरवशाली पथ का अनुसरण कर सम्पूर्णता, श्रेष्ठता व अद्वितीयता प्राप्त कर सकें और पूरी दुनिया को दिखा सकें, कि हमारे पूर्वज कितने श्रेष्ट, कितने बडे वैज्ञानिक है और उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त कितने उच्चकोटि के हैं।

आपका
नन्दकिशोर श्रीमाली

रविवार, 9 सितंबर 2007

मृत्युंजय योगी

पूर्णिमा का दिन वाराणसी का प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट। जगह-जगह चिताएं जल रही है, चड्ड़-चड्ड़ कि आवाज के साथ मृत मानवों के चर्म, मांस-मज्जा जलकर वातावरण को अजीब सी गंध से भर देते हैं। घाट के किनारे ही डोम का घर, और उस के पास ही छोटी-सी बगीची - जहां से पुरा श्मशान घाट और जलती हुई चिताएं साफ़-साफ दिखाई दे रही है।

पिछले दो महीनों से मैं हिडिम्बा साधना कर रहा था। मेरे साथ थे योगी निखिलेश्वरानंन्द, फक्कड़, मस्त, निर्द्वन्द्व, निस्पृह, कोई माया-मोह-ममता नहीं, न काया कि चिन्ता और न माया कि परवाह, अदभुत व्यक्तित्व से सम्पन्न, पैरो में खडाऊं, कटि पर धोती, शरीर का उपरी भाग अनावृत्त, कोई वस्त्र नही। लंबी जटाएं, देदीप्यमान चेहरा, दिप-दिप कराती ज्वलित आंखें। कुल मिलाकर पुरा व्यक्तित्व एक अपूर्व, चुम्बकीय शक्ति से आवृत, पर यह फक्कड़ व्यक्तित्व अकेला, एकांत प्रिय, साधना मे लीन, तल्लीन, कठोर-से-कठोर साधना करने को तैयार, पिछले कुछ महीनों से अघोर साधना मै रत था। श्मशान साधना, चिता साधना, शव साधना, अघोरियों के बीच साधना मे रत, कोई हिचकिचाहट नहीं। मैं दो महीनों से साथ था, पर उदासीन, निस्पृह, निर्मोही। कभी संभव हुआ तो दो-चार मिनिट बोल लिया, कभी वह भी नहीं। मैं जितना ही ज्यादा इस व्यक्तित्व को समझने कि कोशिश करता, उतना ही उलझ जाता।

दशाश्वमेध घाट पर आएं छः दिन हो गए थे, आज सातवां दिन था। सारी रात श्मशान मे साधनारत। यहीं पर अघोरी पाशुपथनाथ से भेट होनी थी, ऐसी संभावना थी, ऐसा ही आभास हुआ।

इन दिनों स्वामी निखिलेश्वरानंन्द कृत्या साधना मै रत थे। कठिन कठोर साधना, ज़रा भी चूक हुई तो प्राण समाप्त। भगवान शंकर की कृत्या को रिझाना, अनुकूल करना क्या कोई मामूली साधना हो सकती हैं?

तभ उस सांझ के धुंधलके में श्मशान घाट कि तरफ़ से एक अघोरी आता हुआ दिखाई दिया। पास आने पर उसे साफ़-साफ़ देखा जना संभव हो सका, मैला, गन्दा, लम्बी उलझी हुई जटाएं, चेहरा गन्दला सा, धंसी हुई पिली आंखें, हाथ में एक खप्पर, लम्बे-लम्बे मैले गन्दगी से भरे नाख़ून और सारा शरीर बदबू से भरा, देखकर घिन आ रही थी। हवा के साथ-साथ बदबू का झोंका सारे सिर को झनझना देता। ऐसी बदबू तो जलते हुए मुरदे से भी नहीं आ रही थी। गन्दगी का साक्षात जीवंत रुप।

वह आकर बैठ गया, हाथ मै खप्पर, खप्पर मै कुछ खाद्य पदार्थ-सा, हाथों मै पीप-सी निकल रही थी और वह उन्ही हाथों से खाद्य पदार्थ लेकर मूंह मे डालता -- ऊफ

बोला, स्वामी! ले बूख लगी तो आ, खा ले। संकेत निखिल्श्वरानंद कि तरफ़ था।

निखिलेश्वरानंद जी उठे और उस अघोरी से सटकर बैठ गए। अघोरी ने उन पीप भरे हाथों से लड्डू का छोटा-सा टुकडा खप्पर से निकाला और आगे बढाया। निखिलेश्वरानंद जी ने लड्डू को अपने हाथ मे ले लिया - ऊफ़, गन्दा घृणित, दुर्गन्धपूर्ण

पर यह क्या? दुसरे ही क्षण सामने पीप-भरा अघोरी अद्रुश्य था, और खडे थे साक्षात् शंकर भगवान विश्वनाथ और निखिलेश्वारानन्द उनके चरणों के पास बैठे थे। उनके सिर पर था, काशी के बाबा विश्वनाथ का वरद हस्त।

शुक्रवार, 22 जून 2007

भारत का उत्थान तुम कर सकते हो - भाग १

मानव जीवन कि विक्षमताओं के बीच अपने आप को प्रतिष्टित करने के लिए अवं उच्चता प्राप्त करने हेतु जीवन में वह तेज और क्रोध होना आवश्यक हैं जो भीतर से शक्ति को जाग्रत कर सके। प्रस्तुत प्रवचन में सदगुरुदेव ने शिष्योंको को एक ललकार भावना देते हुए उन्हें अपने व्यक्तित्व से पहचान कराने का उत्साह जगाया है, जिससे शिष्य कुछ बन सके। गुरुदेव कि ओजस्वीवाणी में यह महान प्रवचन -

आज से हजारों वर्ष पहले सिंधु नदी के किनारे पहली बार आर्यों ने आंख खोली, हमारी पूर्वजों ने पहली बार अनुभव किया कि ज्ञान भी कुछ चीज़ होती है, पहली बार उन्होने एहसास किया कि जीवन मे कुछ उद्देश्य भी होता है, कुछ लक्ष्य भी होता है, तब उन्होने सबसे पहले गुरू मंत्र रचा, गुरू की ऋचाओँ को आवाहन किया। और भी देवताओं का कर सकते थे, भगवान रुद्र का कर सकते थे, विष्णु का कर सकते थे, उन ऋंषियों के सामने ब्रह्मा थे, इंद्र थे, वरुण थे, यम थे, कुबेर थे, सैकड़ों थे।

मगर सबसे पहले जिस मंत्र कि रचना कि या संसार मे सबसे पहले जिस मंत्र कि रचना हुई, वह गुरू मंत्र था। गुरू शरीर नही होता, अगर आप मेरे शरीर को गुरू मानते है तो गलत है आप, यदि मुझ में ज्ञान ही नही है तो फिर मैं आपका गुरू हूं ही नही।

यदि आप एक-एक पैसा खर्च करते है तो मेरे ह्रदय मे भी उस एक-एक पैसे कि वैल्यू है। मै उतने ही ढंग से आपको वह चीज़ देना चाहता हूं और आप उतनी ही पूर्णता के साथ उसे प्राप्त करें तब मेरा कोई अर्थ है। अन्यथा ऐसा लगता है कि आप मुझे दे रहे हैं और मैं भी फोर्मलिटी निभा रहा हूं ऐसा मै नही करना चाहता।

फोर्मलिटी बहुत हो चुकी। फूलों के हार बहुत पहन चूका, आपकी जय जयकार बहुत सुन चूका, टाँगे, बग्गी गाडी मे बहुत चढ़ चूका, हवाई जहाज मे यात्रा कर चूका, विदेश मे यात्रा कर चूका, यह सब बहुत हो चूका। बेटे, पोते, पोतियां, गृहस्थ और संन्यास जीवन सब देख चूका। संन्यास क्या होता है वह भी उच्च कोटी के साथ देख चूका। अब बस एक बात रह गई है कि जितने शिष्य है उन सबको अपने आप में सुर्य बनायें अद्वितीय बनायें। अब केवल इतनी इच्छा रह गई है। और कुछ इच्छा ही नही रह गई है।

सम्राट होते होंगे, मैंने देखा नही सम्राट कैसे होते है, मगर सम्राटों के सिर भी गुरू के चरणों मे झुकते है, उनके मुकुट भी गुरू के चरणों मे पड़ते हैं यदि वह सही अर्थों मे गुरू है, ज्ञान, चेतना युक्त है।

हम अपने आप मे इस शरीर को उतना उत्थानयुक्त बना दें, उतना चेतनायुक्त बना दें, उस मूल उत्स को जान लें कि हम क्या है? और जब हमारा अपना पिछला जीवन देखना शुरू कर देंगे तो आपको इतने रहस्य स्पष्ट होंगे कि आपको आर्श्चय होगा कि क्यों मेरे जीवन मैं ऐसा था, क्यां मैं इतनी ऊंची साधनाएं कर चूका था, फिर मैं इतना कैसे गिर गया? क्या हो गया मेरे साथ?

यह कैसा अटैचमेंट था गुरू के साथ? इतना अटैचमेंट था कि मैं गुरू के बिना एक मिनट भी नही रह सकता था, अब मैं दो-दो महिने कैसे निकाल देता हूँ। जब आपको पिछला जीवन देखने कि क्रिया प्रारंभ होने लगेगी, तब आप एक क्षण भी अलग नही रह पाएंगे, तब एहेसास होगा कि हम बहुत बड़ा अवसर खो रहे है, बहुत बडे समय से वंचित हो रहे हैं, क्षण एक-एक करके बीतते जा रहे है और जो क्षण बीतते जा रहे हैं वें क्षण लॉट कर नहीं आ सकते। जो समय बित गया, बित गया। बित गया तो समय निकल गया, इस शरीर में भी एक सलवट और बढ गई, कल एक और सलवट बढ जाएगी।

अगर सर्प ऐसा कर सकता है, कायाकल्प कर सकता है, अपनी पुरी केंचुली को, झुर्रीदार त्वचा को, अपने बुढ़ापे को निकाल कर एक तरफ रख देता है, पुरा नवीन ताजगी युक्त वापस शारीर उसका बन सकता है तो हमारा क्यों नही बन सकता ?

इसलिये नही बन सकता क्योंकि केवल उस वासुकी के पास यह ज्ञान रह गया है और हमने उसे समझा नही, हमने बस उसको विषैला समझ लिया, जहरीला समझ लिया। आपने उसके ज्ञान को नही समझा। आपने मुझे फूलों के हार पहना दिए, जय जय कार कर दिया मगर आप मेरा ज्ञान नही समझ पाये। जब ज्ञान नही ग्रहण कर पाएंगे तो फिर एक बहुत बड़ा अभाव आपके जीवन मे भी रहेगा। मेरे जीवन मे भी रहेगा कि यह ज्ञान, यह चेतना आप प्राप्त नहीं कर पाए। यह ज्ञान, यह चेतना यां तो पुस्तकों मे मिल पाएगी या प्रामाणिक होगी। और मैं ऐसा कोई ग्रंथ लिखना चाहता भी नहीं कि मेरे मरने के पांच सौ साल बाद भी कोई कहे कि इसमे गलती है। पांच सौ साल बाद भी लोग कहे कि यह तो बिलकुल नवीन और प्रामाणिक है एक चेतना युक्त है। वैसा ग्रंथ मैं आपको बनाना चाहता हूँ।

आप आपने आप को कायर या बुजदिल समझते हैं, आप आपने बारे में समझते हैं कि आप कुछ कर नही सकते। मैं प्रवचन बोल कर भी जाऊंगा तो मुझे मालूम है कि आप सब कुछ सुनने के बाद भी वही खडे रह जायेंगे कि मैं क्या कर सकता हूँ, इस उम्र मे होगा भी क्या, अब करने से लाभ भी क्या, अब मैं तो बुढा हो गया मेरा तो शरीर कमजोर है, अब मैं कुछ नहीं कर सकता।

यह आपके जीवन कि हीन भावना बोल रही है आप नहीं बोल रहे हैं। आपके ऊपर समाज ने जो प्रहार किए, वे बोल रहे हैं, आप नहीं बोल रहे हैं। आपके जीवन में जो दुःख है उन दुखों ने आपको इतना बोझिल बना दिया है वह बोल रहे हैं। वृध्दावस्था आ ही नहीं सकती, संभव नही हैं। बुढ़ापा तो एक शब्द है, नाम है। हमने एक नाम लिया कि बुढ़ापा है। बुढ़ापा शब्द क्या चीज है?