रविवार, 28 फ़रवरी 2010

समर्पण

कथा महाभारत के युद्ध की है| अश्वत्थामा ने अपने पिता की छलपूर्ण ह्त्या से कुंठित होकर नारायणास्त्र का प्रयोग कर दिया| स्थिति बड़ी अजीब पैदा हो गई| एक तरफ नारायणास्त्र और दुसरी तरफ साक्षात नारायण| अस्त्र का अनुसंधान होते ही भगवान् ने अर्जुन से कहा - गांडीव को रथ में रखकर नीचे उतर जाओ ... अर्जुन ने न चाहते हुए भी ऐसा ही किया और श्रीकृष्ण ने भी स्वयं ऐसा ही किया| नारायणास्त्र बिना किसी प्रकार का अहित किए वापस लौट गया, उसने प्रहार नहीं किया, लेकिन भीम तो वीर था, उसे अस्त्र के समक्ष समर्पण करना अपमान सा लगा| वह युद्धरथ रहा, उसे छोड़कर सभी नारायणास्त्र के समक्ष नमन मुद्रा में खड़े थे| नारायणास्त्र पुरे वेग से भीम पर केन्द्रित हो गया| मगर इससे पहले कि भीम का कुछ अहित हो, नारायण स्वयं दौड़े और भीम से कहा - मूर्खता न कर! इस अस्त्र की एक ही काट है, इसके समक्ष हाथ जोड़कर समर्पण कर, अन्यथा तेरा विध्वंस हो जाएगा|

भीम ने रथ से  नीचे उतर कर ऐसा ही किया और नारायणास्त्र शांत होकर वापस लौट गया, अश्वत्थामा का वार खाली गया|

यह प्रसंग छोटा सा है, पर अपने अन्दर गूढ़ रहस्य छिपाये हुए है ... जब नारायण स्वयं गुरु रूप में हों, तो विपदा आ ही नहीं सकती, जो विपदा आती है, वह स्वयं उनके तरफ से आती है, इसीलिए कि वह शिष्यों को कसौटी पर कसते है ... कई बार विकत परिस्थियां आती हैं और शिष्य टूट सा जाता है, उससे लड़ते| उस समय उस परिस्थिति पर हावी होने के लिये सिर्फ एक ही रास्ता रहता है समर्पण का ... वह गुरुदेव के चित्र के समक्ष नतमस्तक होकर खडा हो जाए और भक्तिभाव से अपने आपको गुरु चरणों में समर्पित कर दे और पूर्ण निश्चित हो जाए ... धीरे धीरे वह विपरीत परिस्थिति स्वयं ही शांत हो जायेगी ... और फिर उसके जीवन में प्रसन्नता वापस आ जायेगी|

- मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान फरवरी २००१

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

मंत्र शक्ति

भगवान् राम के पूर्वज सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के जीवन का एक प्रसंग है - एक बार लंका नरेश रावण, राजा हरिश्चंद्र की तपश्चर्या से प्रभावित होकर उनके दर्शन करने आया।

राजमहल के द्वार पर पहुंचकर रावण ने द्वारपाल को अपने आने का प्रयोजन बताया और कहा - 'मैंने राजा हरिश्चंद्र की तपस्या और मंत्र साधना के विषय में काफी प्रशंसा सूनी है, मैं उनसे कुछ सीखन की कामना लेकर आया हूं।'

द्वारपाल ने रावण को उत्तर दिया - 'हे भद्र पुरूष! आप निश्चय ही हमारे राजा से मिल सकेंगे, किन्तु अभी प्रतीक्षा करनी होगी, क्योंकि अभी वे अपनी साधना कक्ष में साधना, उपासना आदि कर रहे हैं।'

कुछ समय बाद द्वारपाल रावण को साथ लेकर राजा के पास गया। रावण ने झुककर प्रणाम किया और राजा हरिश्चंद्र से अपने मन की बात कही, की वह उनसे साधनात्मक ज्ञान लाभ हेतु आया है।

वार्तालाप चल ही रहा था, की एकाएक राजा हरिश्चंद्र का हाथ तेजी से एक ओर घुमा। पास रखे एक पात्र से उन्होंने अक्षत के कुछ दानें उठाएं और होठों से कुछ अस्पष्ट सा बुदबुदाते हुए बड़ी तीव्रता से एक दिशा में फ़ेंक दिए। रावण एकदम से हतप्रभ रह गया, उसने पूछा -

'राजन! यह आपको क्या हो गया था?'

राजा हरिश्चंद्र बोले - 'यहां से १४० योजन दूर पूर्व दिशा में एक हिंसक व्याघ्र ने एक गाय पर हमला कर दिया था, और अब वह गाय सुरक्षित है।' रावण को बड़ा अचरज हुआ, वह बिना क्षण गवाएं इस बात को स्वयं जाकर देख लेना चाहता था। चलते-चलते रावण जब उस स्थल पर पहुंचा, तो देखा की रक्तरंजित एक व्याघ्र भूमि पर पडा है। व्याघ्र को अक्षत के वे दाने तीर की भांति लगे थे, जिससे वह घायल हुआ था। राजा हरिश्चंद्र की मंत्र शक्ति का प्रमाण रावण के सामने था।

आज भी मंत्रों में वही शक्ति है, वही तेजस्विता है, जो राजा हरिश्चंद्र के समय थी। आवश्यकता है, तो मनःशक्ति को एकाग्र करने की, पूर्ण दृढ़ता के साथ मंत्रों का ह्रदय से उच्चारण करने की।

मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान, जनवरी २००९