रविवार, 11 जुलाई 2010

साधनाओं के नियम

  • साधनाओं को कोई भी गृहस्थ संपन्न कर सकता है, इसके लिये किसी भी विशेष वर्ग या जाति के आधार पर कोई बन्धन नहीं है, जिसको भी इस प्रकार की साधनाओं में आस्था हो, वह इन साधनाओं को संपन्न कर सकता है|
  • इस प्रकार की साधनाओं में पुरुष या स्त्री, युवा या वृद्ध, विवाहित या अविवाहित जैसा कोई भेद नहीं है, कोई भी साधना संपन्न कर सकता है| महिलाओं के लिये रजस्वला-समय किसी भी प्रकार की साधना के लिए वर्जित है, जिस दिन रजस्वला  हो उस दिन से अगले पांच दिनों तक वह किसी भी प्रकार की साधना या पूजा अनुष्ठान संपन्न न करे, परन्तु यदि उसने अनुष्ठान प्रारम्भ कर दिया हो और बीच में रजस्वला हो गयी हो, तो उस अनुष्ठान या साधना को पांच दिनों के लिये छोड़ दे और छटे दिन स्नान कर, सर को धो कर, पवित्र होकर पुनः साधना या अनुष्ठान प्रारम्भ कर सकती है, ऐसा होने पर साधना में व्यवधान नहीं माना जाता| पीछे जहां तक साधना की है या जीतनी संख्या में जप कर ली है, उसके आगे की गणना की जा सकती है|
  • प्रत्येक साधना की जप संख्या, दिनों की संख्या निश्चित होती है; तब तक साधना चलती रहे, उस अवधि में साधक को चाहिए कि एक समय भोजन करें और सात्त्विक आहार ग्रहण करें, मांस, शराब, प्याज, लहसुन आदि वर्जित है; भोजन का सीधा सम्बन्ध है, अतः शुद्ध खान-पान के मामले में सतर्कता बरतें, होटल में खाना यथासंभव टालें, क्योंकि वहां पर शुद्धता का पूरा ध्यान नहीं रह पाता, जो कि इस कार्य के लिये आवश्यक होता है|
  • साधना करते समय किसी भी प्रकार की वस्तु खाना या सेवन करना अनुकूल नहीं हैं, व्यक्ति मंत्र जप प्रारम्भ करने से पूर्व दूध, चाय या भोजन ले सकता है| जब मंत्र जप चालू हो तब चाय, जल, भी पीना वर्जित है, यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न भी हो जाये, तो इसके बाद पवित्रीकरण करने के उपरांत ही पुनः मंत्र जप प्रारम्भ करना चाहिए|
  • साधनाकाल में यथासंभव भूमि पर सोना उचित रहता है, भूमि पर किसी भी प्रकार का बिछौना सो सकते हैं, विशेष परिस्थितियों में पलंग आदि का उपयोग कर सकते हैं, परन्तु जहां तक संभव हो भूमि शयन ही करें|
  • साधनाकाल में स्त्री संसर्ग सर्वथा वर्जित है, इस अवधि में पूरी तरह से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें, इस अवधि में फ़िल्मी पत्रिकाएं पढ़ना, सिनेमा देखना, अन्य स्त्रियों से लम्बिई बातचीत करना आदि निषेध है, यथासंभव मन को संयत और शांत बनाए रखें|
  • साधना प्रारम्भ करने से पूर्व स्नान कर लेता उचित रहता है, यदि बीमार हो या अशक्त हो, तो ऐसी परिस्थिति में कपड़ा भिगोकर पुरे शरीर को पौंछ लेता चाहिए, परन्तु जहां तक हो सके स्नान करना ही उत्तम माना जाता है|
  • पैंट, निकर या पायजामा पहन कर साधना नहीं की जा सकती, इसके लिये धोती पहनना उचित माना गया है|
  • एक धोती कमर के नीची पहिन लें और गुरु पीताम्बर ओढ़ लें, परन्तु यदि सर्दी का मौसम हो, तो उनी कम्बल भी ओढ़ सकता है, धोती  हमेशा धूलि हुई स्वच्छ हो|
  • साधना काल में क्षौर कर्म नहीं करवाना चाहिए, अर्थात सर के या दाढ़ी के बाल नहीं कटावें|
  • साधना काल में बीडी-सिगरेट, तम्बाकू, पान आदि का सेवन वर्जित है, जितने दिन तक साधना चले उतने दिन तक किसी प्रकार का व्यसन न करें|
  • साधना काल में स्नान करते समय साबुन का प्रयोग किया जा सकता है, परन्तु इत्र आदि का प्रयोग न करें, साधना के बाद कहीं बहार जाते समय जूतों का प्रयोग किया जा सकता है|
  • यदि साधक नौकरी या व्यापार कर रहा हो और रात्रिकालीन साधना हो, तो दिन में नौकरी कर सकतें, यदि साधना पूरी होने तक व्यापार अथवा नौकरी से अवकाश ले लें, तो ज्यादा उचित रहता है|
  • साधना काल में सिनेमा देखना या किसी राग-रंग, गायन, संगीत महफिल आदि में भाग लेता वर्जित है|
  • साधना काल में कम से कम बोलें, बहुत अधिक आवश्यक होने पर ही बातचीत करें और उतनी ही बातचीत करें, जीतनी जरूरी है, व्यर्थ में गप्पे लगाना बहस करना सर्वथा वर्जित हैं|
  • साधना घर के एकांत कक्ष में, किसी मन्दिर, नदी तट आदि स्थान पर जाकर की जा सकती है, पर इस बात का ध्यान रखें कि साधना स्थल ऐसा हो, जो शांत और कोलाहल से दूर हो; वह स्थान ऐसा होना चाहिए, जहां किसी प्रकार का व्यवधान उपस्थित न होता हो|
  • साधना प्रारंभ करने से पूर्व साधना संबंदी सारे उपकरण चित्र, यंत्र, माला आदि एक स्थान पर एकत्र कर लेनी चाहिए, पूजन सामग्री की व्यवस्था भी पहले से ही कर लेनी चाहिए, साथ ही साथ अपने गुरु या साधना बताने वाले व्यक्ति से साधना से सम्बंधित सरे तथ्य पहले से ही भली प्रकार समझ लेने चाहिए|
  • कभी-कभी साधना काल में आखोने के सामने कई अजीबोगरीब दृश्य दिखाई पड़ते हैं, कई बार विचित्र आवाजें सुनाई पड़ती है, कई बार ऐसा भी अनुभव होता है, कि जैसे आपको कोई आवाज दे रहा हो, परन्तु इन बातों की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए और बराबर अपनी साधना में लगे रहना चाहिए|
  • साधना काल में अपने सामने जल का लोटा भर रख देना चाहिए, उबासी, जम्भाई या अपां वायु के निकलने पर जल को कानों से स्पर्श कर लेने से यह दोष मिट जाता है; यदि बीच में लघुशंका तेवर हो जाय, तो उठ कर लघुशंका कर लेता चाहिए, पर इसके बाद पुनः स्नान कर दूसरी धोती पहिन कर ही साधना में बैठना चाहिए|
  • साधनाकाल में माला हाथ से गिरानी नहीं चाहिए, इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखें, यदि गिर जाय, तो पुनः प्रारम्भ से मंत्र जप करना चाहिए, ज्यादा अच्छा यह होगा कि गौमुखी (माला रखने का वस्त्र) में माला रख कर मंत्र जप करें, जिससे कि माला गिरने की समस्या नहीं रहे, गौमुखी किसी भी प्रकार के कपडे की हो सकती हैं|
  • किसी भी प्रकार की साधना या मंत्र जप प्रारम्भ करने से पूर्व दीक्षित होना जरूरी है, क्योंकि दीक्षा प्राप्त साधक ही अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता हैं; इसके बाद साधना प्रारम्भ करें, तो सबसे पहले एक माला गुरु मंत्र की जप कर, गुरु की पूजा कर उनके सामने निवेदन कर मंत्र जप प्रारम्भ करें, ऐसा क्रम नित्य रखना चाहिए, जिससे कि अप्रत्यक्ष रूप से गुरु सहायक बने रहे|
  • मंत्र जप के बीच में कैसी भी परिस्थिति आ जाय, उठाना नहीं चाइए, किसी से बातचीत होठों या संकेतों से नहीं करना चाहिए, यदि ऐसी परिस्थिति आ भी जाय तो उठ कर आचमन तथा पवित्रिकर्ण कर पुनः साधना में बैठे|
  • साधना के प्रति साधक को पूरा विश्वास और श्रद्धा होनी चाहिए, बिना आस्था, विश्वास के कोई भी साधना सफल नहीं हो सकती|
  • साधक सर्वथा शांत बने रहे, किसी भी प्रकार का सन्देह मन में नहीं आवें और न उग्रता अथावा क्रोध ही प्रदर्शित करें, साधना की अवधि में अशुद्ध भाषण न करें, असत्य न बोलें और कोई ऐसा कार्य न करें जो निति के विरुद्ध हो, पूरी निष्ठा और गुरु आशीर्वाद लेकर साधना में प्रवृत्त होने से निश्चय ही सफलता प्राप्त होती है| 
--- ये किसी भी प्रकार की साधना के आधारभूत तथ्य है, जो साधक को अपनाने चाहिए, ऐसा करने पर उसे सफलता स्वाभाविक रूप में मिल जाती है|

- सदगुरुदेव श्री अरविन्द श्रीमालीजी 

रविवार, 27 जून 2010

युग परिवर्तन

संसार निरन्तर परिवर्तनशील है और समय के साथ-साथ व्यक्ति की मान्यताएं, भावनाएं और इच्छाएं बदलती रही हैं; कुछ समय पूर्व सामाजिक व्यवस्था ऐसी थी, जब व्यक्ति की आवश्यकताएं न्यून थीं और वे परस्पर मिल कर अपनी आवश्यकाओं की पूर्ति कर लेते थे, किसान अपना अनाज मोची को देता था और बदले में जूते बनवा लेता था, मोची चमड़े का काम करके दर्जी को देता था, और बदले में अपने कपडे सिलवा लेता था, इस प्रकार वे परस्पर एक-दुसरे के सहयोग से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेते थे|

परन्तु धीरे-धीरे युग में परिवर्तन आया और व्यक्ति के मन में एक-दुसरे के प्रति सन्देह का भाव बढ़ा; उसने सोचा, कि मैं अनाज दे रहा हूं, वह ज्यादा कीमती है, इसकी अपेक्षा यह जो मोची मुझे काम करके देता है, उसका मूल्य कम है, ऐसी स्थिति आने पर मुद्रा का विनिमय प्रारम्भ हुआ, तब जीवन में एक-दुसरे के कार्य की पूर्ति में मुद्रा मुख्य आधार बन गया|

लेकिन समय परिवर्तन के साथ ही साथ सामाजिक जीवन ज्यादा से ज्यादा जटिल होता गया, एक-दुसरे से आगे बढ़ने की होड़ लग गई और जल्दी से जल्दी अपने लक्ष्य तक पहुंचने की भावना तीव्र हो गई, प्रत्येक व्यक्ति इस प्रयत्न में लग गया, कि जल्दी से जल्दी  उस गंतव्य स्थल पर पहुंच जाय, जो कि उसका लक्ष्य है; फलस्वरूप उसमें प्रतिस्पर्धा, द्वेष और एक-दुसरे को पछाड़ने की प्रवृत्ति बढ़ गई, व्यापारी जल्दी से जल्दी लखपति बनने की फिराक में मशगूल हो गए, अधिकारियों ने अपने विभाग में सबसे ऊँचे पद पर पहुंचने के लिए जी-तोड़ प्रयास करना प्रारम्भ कर दिया और इस प्रकार एक ऐसी होड़ लग गई, जिसके रहते किसी प्रकार की शान्ति नहीं, प्रत्येक व्यक्ति के मन में एक छटपटाहट, एक बेचैनी, एक असंतोष की भावना बढ़ने लगी .. परन्तु इससे एक लाभ यह भी हुआ, कि व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा सक्रीय हो गया और इस प्रकार इस प्रतिस्पर्धा के फलस्वरूप उन्नति के द्वार सभी के लिए सामान रूप से खुल गए|

परन्तु जब एक लक्ष्य हो और प्रतिस्पर्धी ज्यादा हों, तो एक विशेष प्रकार की होड़ व्यक्ति के मन में जम जाती है, वह अपने भौतिक प्रयत्नों के साथ-साथ भारत की प्राचीन विद्याओं की तरफ भी उन्मुख होने लगा और उनके माध्यम से अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी प्रयत्नशील बना, उसने इस सम्बन्ध में प्रयत्न भी किये और जब उसने अनुभव किया, कि अन्य भौतिक प्रयत्नों की अपेक्षा इनसे जल्दी और निश्चित सफलता मिलती है, तब वह इसकी खोज में ज्यादा प्रयत्नशील बना, वह ऐसे मन्त्रों व् साधना विधियों की खोज में बढ़ा, जिससे उसकी इच्छा पूर्ति सहजता से और शीघ्र हो सके|

मंत्र-तंत्र, साधना-उपासना, पूजा-पाठ आदि हमारी प्राचीन संस्कृति का मजबूत आधार है| एक ऐसा समय भी था, जब हम इनकी बदौलत संसार में अग्रगण्य थे और हमने समस्त भौतिक सुविधाओं को सुलभ कर लिया था, जिस समय पूरा संसार अज्ञान और अशिक्षा के अन्धकार में डूबा था, उस समय भी हमने प्रकृति को अपने नियंत्रण में सफलतापूर्वक ले लिया था, लंकाधिपति रावण ने पवन, अग्नि और अन्य प्राकृतिक तत्वों को मन्त्रों की सहायाता से इतना आधिक नियंत्रण में कर लिया था, कि वे उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करते थे, हमारे पूर्वज त्रिकालदर्शी थे और अपने स्थान पर बैठे-बैठे हजारों-लाखों मील दूर घटित घटनाओं को अपनी आँखों से देखने में समर्थ थे - ये सारे तथ्य इस बात को स्पष्ट करते हैं, कि हमारी परम्परा अत्यंत समृद्ध रही है और हमने इन मंत्र, तंत्र, यंत्रों के माध्यम से अदभुत सफलताएं प्राप्त की हैं|

कालांतर में हम पर विदेशी आक्रमण होते गए और उन लोगों ने हमारे उच्चकोटि के ग्रन्थ जला कर राख कर दिए, इस प्रकार से हम एक समृद्ध परम्परा से वंचित हो गए, हममे वह क्षमता नहीं रही, जो कि हमारे पूर्वजों में थी|

फिर समय बदला और लोगों ने यह महसूस किया, कि बिना इन मंत्र-तंत्रों की सहायता से हम अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकते; इस संघर्ष में यदि हमें टिके रहना है, तो यह जरूरी है, कि इस उच्चकोटि की विद्या को पुनः प्राप्त कर योग्य गुरु से भली प्रकार समझा जाय, उन सारे नियमों-उपनियमों का पालन कर इन साधनाओं में सफलता प्राप्त की जाय, जिससे कि हमारा जीवन सुखमय, उन्नतिदायक और परिपूर्ण हो|

परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है, ऐसी स्थिति में श्रेष्ठ मंत्र मर्मज्ञ प्रकाश में नहीं आये; जिनको ज्ञान है, वे स्वान्तः सुखाय पद्धति में विश्वास करते हैं और हिमालय के उन स्थानों पर तपस्यारत हैं, जहां आम आदमी का जाना संभव नहीं है| जो गृहस्थ जीवन में उच्चकोटि के अध्येता हैं, वे अपनी ही साधना में लीन हैं, उन्हें स्वार्थ का, छल-कपट का ज्ञान नहीं है, इसकी अपेक्षा नकली चमक-दमक वाले साधू-सन्तों और संन्यासियों की भीड़ एकत्र हो गई, जो आडम्बर से तो परिपूर्ण थे, लेकिन उनमे ठोस ज्ञान का सर्वथा अभाव था| सामान्य जन श्रेष्ठ और नकली साधू-सन्तों में भेद या अन्तर नहीं कर पाता, फ़लस्वरूप वे कई स्थानों पर धोके के शिकार हुए और इस प्रकार धीरे-धीरे जब उनका कार्य नहीं हुआ तो उनका विश्वास डगमगाने लगा, उन्हें आशंका होने लगी - ये मंत्र-तंत्र वास्तविक है भी या नहीं?

और इस प्रकार के विचारों ने उनकी आस्था की नींव हिला दी| परन्तु नकली चमक-दमक के बीच में ऐसे भी साधू, योगी या  गृहस्थ गुरु विद्यमान रहे, जो निःस्वार्थ भाव से अपने रास्ते पर निरन्तर गतिशील बने रहे, चमक-दमक को देखने के बाद वे उस  नकली जमात में नहीं मिले, जो स्वार्थ पर आधारित थी, क्योंकि उनके पास ठोस ज्ञान था, एक समृद्ध परम्परा थी, जिससे माध्यम से असंभव कार्य को भी संभव किया जा सकता था|

जब सामान्य जनता उन नकली लोगों से उब गई, तो उन्हें अपनी गलती महसूस और वे इस खोज में लगे, कि हमारे पूर्वजों की यह समृद्ध परम्परा गलत नहीं हो सकती, अवश्य ही इन नकली लोगों में ही त्रुटी है या इन्हें इस सम्बन्ध में पूरा ज्ञान नहीं है, जिससे कि मनोकामना सिद्धि हो सके|

आज का मानव-समाज इतना अधिक जटिल हो गया है, कि मानव की समस्याओं का कोई अंत नहीं है, आगे बढ़ने में पग-पग पर कठिनाइयां और समस्याओं का सामना करना ही पड़ता है, जिससे उसकी प्रगति अवरुद्ध हो जाती है|

आर्थिक समस्या, पुत्र न होने की समस्या, पुत्र प्राप्त होने पर भी कुपुत्र होने की समस्या, दुराचारी पत्नी की समस्या, पति-पत्नी में अनबन की समस्या, व्यर्थ में मुकदमे और बाधाओं की समस्या, रोजी की समस्या, व्यापार प्रारंभ न होने की समस्या, व्यापार वृद्धि की समस्या, विभिन्न रोगों से ग्रसित होने की समस्या, मानसिक चिंता दूर न होने की समस्या, पुत्री के लिये उपयुक्त वर न मिलने की समस्या, पुत्री का विवाह होने के बाद उसका वैवाहिक जीवन सुखी न होने की समस्या, नौकरी की समस्या, प्रमोशन की समस्या, घर में सुख शान्ति की समस्या, अधिकारीयों से मतभेद होने की समस्या, आकस्मिक मृत्यु की समस्या, भाग्योदय न होने की समस्या, जरूरत से ज्यादा कर्जा बढ़ जाने की समस्या, समय पर उच्च सम्मान प्राप्त न होने की समस्या, भूत-प्रेत-पिशाच बाधा, घर में सुख-शान्ति न रहने की समस्या|

-- और इस प्रकार की सैंकड़ों-हजारों समस्याएं हैं, जिनसे पग-पग पर व्यक्ति को जूझना पड़ता है, जिससे उनका अत्यधिक श्रम और शक्ति इन्हीं समस्याओं को हल करने में लग जाती हैं|

इन समस्याओं का समाधान सामाजिक कार्यों के माध्यम से संभव नहीं है और ना ही विज्ञान के पास इसका कोई हल है, इनके लिये कुछ आधार या कुछ ऐसी विद्याओं की जरूरत है, जो गूढ़ विद्याएं कही जाती हैं, इन विद्याओं के अन्तर्गत यंत्र-तंत्र, साधना-उपासना, पूजा-पाठ मंत्र जप आदि जरूरी है|

अभी तक ये कार्य विशेष पंडित वर्ग ही संपन्न करता रहा, परन्तु धीरे-धीरे इन पंडितों के स्तर में भी न्यूनता आ गई, उनकी आगे की पीढ़ी इतनी योग्य न हो  सकी, जो दुसरे लोगों की समस्याओं को इन विद्याओं के माध्यम से दूर कर सकें; तब वे व्यक्ति अपने गुरु के समीप बैठ कर उन उपायों की खोज करने लगे, जिसके माध्यम से वे स्वयं इस प्रकार की साधनाएं संपन्न कर समस्याओं से मुक्ति पा  सके| आपके भी जीवन में ऐसे गुरु का आगमन हो यही आपको आशीर्वाद|

- श्री नारायण दत्त श्रीमाली

रविवार, 28 जून 2009

मैं तुम्हें उन इन्द्र धनुष के रंगों पर ...

गुरु पूर्णिमा पर सदगुरुदेव ने आहवान किया था

यह शिष्य पूर्णिमा है

मैं तुम्हारें पिछले कई जन्मों का साक्षीभूत हूं
मैंने अपना खून देकर तुम्हें सींचा है
मैं तुम्हारा हर दृष्टी से रखवाला हूं


यह पर्व सही अर्थों में गुरु का पर्व है ही नहीं, यह तो शिष्य पर्व है, इसे शिष्य पूर्णिमा कहा जाता है, क्योंकि यह शिष्य के जीवन का एक अन्तरंग और महत्वपूर्ण क्षण है। यह उसके लिए उत्सव का आयोजन है, यह मन की प्रसन्नता को व्यक्त करने का त्यौहार है, यह ऐसा पर्व है, जो जीवन की प्रफुल्लता, मधुरता और समर्पण के पथ पर गुरु के चरण चिह्न अंकित कर अपने आप को सौभाग्यशाली मानता है।

यदि तुम मेरे आत्मीय हो, मेरे प्राणों के घनीभूत हो, मेरे जीवन का रस और चेतना हो तो यह निश्चय ही तुम्हारे लिए उत्सव, आनन्द और सौभाग्य का पर्व है, क्योंकि शिष्य अपने जीवन की पूर्णता तभी पा सकता है, जब वह गुरु ऋण से उऋण हो जाय। मां ने तो केवल तुम्हारी देह को जन्म दिया, पर मैंने उस देह को संस्कारित किया है, उसमें प्रानश्चेतना जाग्रत की है, उस तेज तपती हुई धुप में वासंती बहार का झोंका प्रवाहित किया है, मैंने तपते हुए भूखण्ड पर आनन्द के अमिट अक्षर लिखने की प्रक्रिया की है, और मैंने तुम्हे पुत्र शब्द से भी आत्मीय प्राण शब्द से संबोधित किया है।

और यह गुरु के द्वारा ही सम्भव हो सका है, यह इस जीवन का ही नहीं, कई-कई जन्मों का लेखा-जोखा है। मैं तुम्हारें इस जन्म का साक्षीभूत गुरु ही नहीं हूं, अपितु पिछले २५ जन्मों का लेखा-जोखा, हिसाब-किताब मेरे पास है, और हर बार मैंने तुम्हें आवाज दी है, और तुमने अनसूनी कर दी है, हर बार तुम्हारे प्राणों की चौखट पर दस्तक दी है, और हर बार तुम किवाड़ बंद करके बैठ गए हो, हर बार तुम्हें झकझोरने का, जाग्रत करने का, चैतन्यता प्रदान करने का प्रयास किया है, और हर बार तुमने अपना मुंह समाज की झुरभुरी रेत में छिपाकर अनदेखा, अनसुना कर दिया है।

पर यह कब तक चलेगा, कितने-कितने जन्मों तक तुम्हारी यह चुप्पी, तुम्हारी यह कायरता, तुम्हारी यह बुजदिली मुझे पीडा पहुंचाती रहेगी, कब तक मैं गला फाड़-फाड़ कर आवाजें देता रहूंगा और तुम अनसुनी करते रहोगे, कब तक मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर सिद्ध योगा झील के किनारे ले जाने का प्रयास करूंगा और तुम हाथ छुडाकर समाज की उस विषैली वायु में साँस लेने के लिए भाग खड़े जाओगे, ऐसा कब तक होगा? इस प्रकार से कब तक गुरु को पीडा पहुंचाते रहोगे, कब तक उसके चित्त पर अपने तेज और नुकीले नाखूनों से घाव करते रहोगे, कब तक उसके प्राणों को वेदना देते रहोगे?

मैंने तुम्हें अपना नाम दिया है, और इससे भी बढ़ कर मैंने तुम्हें अपना पुत्र और आत्मीय कहा है, अपना गोत्र (निखिल गोत्र) तुम्हें प्रदान किया है और अपने जीवन के रस से सींच-सींच कर तुम्हारी बेल को मुरझाने से बचाने का प्रयास किया है, तुम्हारी सूखी हुई टहनियों में रस प्रदान करने का सफलतापूर्वक प्रयास किया है, और मेरा ही यह प्रयत्न है, की इन सूखी हुई टहनियों में फिर नई कोपलें आवें, फिर वातावरण सौरभमय बने, मैंने अपने जीवन के प्रत्येक कषक को इसके लिए लगाया है, अपनी जवानी को हिमालय के पत्थरों पर घिस-घिस कर तुम्हें अमृत पिलाने का प्रयास किया है, तुम्हारें प्रत्येक जन्म में मैंने चेतना देने की कोशिश की है, और हर बार तुम्हारे मुरझाये हुए चहरे पर एक खुशी, एक आहलाद एक चमक प्रदान करने का प्रयास किया है।

पर यह सबकुछ यों ही नहीं हो गया, इसके लिए मुझे तुमसे भी ज्यादा परिश्रम करना पडा है। मैंने अपने शरीर की बाती बना कर तुम्हारे जीवन के अंधकार में रोशनी बिखरने का प्रयत्न किया है, अपने प्राणों का दोहन कर उस अमृत जल से तुम्हारी बेल सींचने का और हरी-भरी बनाए रखने का प्रयास किया है, तिल-तिल कर अपने आप को जलाते हुए भी, तुम्हारे चहरे पर मुस्कराहट देने की कोशिश की है , और मेरा प्रयेक क्षण, जीवन का प्रत्येक चिन्तन इस कार्य के लिए समर्पित हुआ है, जिससे कि मेरे मानस के राजहंस अपनी जाति को पहचान कर सकें, अपने स्वरुप से परिचित हो सकें, अपने गोत्र से अभिभूत हो सकें और मेरे ह्रदय के इस मान सरोवर में गहराई के साथ दुबकी लगाकर लौटते समय मोती ले सकें।

... और यह हर बार हुआ है, और यह पिछले जन्मों से होता रहा है, क्योंकि मैं हर क्षण तुम्हारे लिए ही प्रयत्न किया है, मेरा जीवन अपने स्वयं के लिए या परिवार के लिए नहीं है, मेरा जीवन का उद्देश्य तो शिष्यों को पूर्णता देने का प्रयास है, और इसके लिए मैं सिद्धाश्रम जैसा आनन्ददायक और अनिर्वचनीय आश्रम छोडा और तुम्हारें इन मैले-कुचैले, गलियारों में आकर बैठा, जो वायुवेग से एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाने के लिए सक्षम था, उसे तुम्हारें लिए अपने आप को एक छोटे से वाहन में बंद कर लिया, जिसका घर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड था, और किसी भी ग्रह या लोक में विचरण करता हुआ जो निरंतर आनंदयुक्त था, उसने तुम्हारे लिए अपने आप को एक छोटे से घर में आबद्ध, तुम्हारें लिए इस समाज से जूझा, आलोचनाएं सुनीं, गालियां खाई, और कई प्रकार के कुतर्कों का सामना किया, यह सब क्यों? क्या जरूरत थी यह सब सहन करने कि, झेलने की, भुगतने की?

और मैंने ऐसा किया, प्रत्येक क्षण इस बात के लिए कृत संकल्प था, और हूं कि मैं तुम्हें समाज में गर्व से सर तानकर खडा रहने की प्रेरणा दूं? मैं तुम्हें इस गन्दगी से भरे समाज में देवदूत बनाकर खडा कर सकूं, तुम्हारी आखों में एक चमक कर सकूं, तुम्हारे पंखों में इतनी ताकत दे सकूं, कि तुम आकाश से सुदूर ऊंचाई पर बिना थके पहुँच सको, और इस ब्रम्हत्व का, आनन्द ले सको, मैं तुम्हें उन इन्द्र धनुष के रंगों पर रंग बिखरने के लिए तैयार कर सकूं, जहां विस्तृत आकाश हो, जहां आनन्द की शीतल बयार हो, जहां पूर्णता और सिद्धियाँ जयमाला लिए तुम्हारें गले में डालने के लिए उद्यत और उत्सुक हों।

और यह सब बराबर हो रहा है, तुमने अपने आपको पहली बार पहचानने का प्रयत्न किया है, पहली बार यह अहसास किया है, कि तुम संसार में अकेले नहीं हो, कोई तुम्हारा रखवाला अवश्य है, जो तुम्हारें जीवन की बराबर चौकीदारी कर रहा है, कोई ऐसा व्यक्तित्व तुम्हारे जीवन में अवश्य है, जिसे अपनी चिंताएं, परेशानियां और समस्याएं खुशी-खुशी देकर अपने आपको हल्का कर सकते हो, और मुझे तुम जो दे रहे हो, उससे मुझे प्रसन्नता है।

क्योंकि मैं तुम्हारें साथ हूं, क्योंकि तुम्हारें पांव मेरे पाव के साथ आगे बढ़ रहे है, क्योंकि मैं तुम्हारें जीवन का ध्यान रखने वाला, तुम्हारे जीवन को आल्हाद कारक बनाने वाला और तुम्हारें जीवन का प्रत्येक क्षण का हिसाब-किताब रखने वाला हूं।

मैं इन सबके लिए गुरु पूर्णिमा पर आवाज दे रहा हूं, क्योंकि यह तुम्हारा स्वयं का पर्व है। यदि शिष्य है, यदि सही अर्थों में वह मेरी आत्मा का अंश है, यदि सही अर्थों में मेरी प्राणश्चेतना है, तो उसके पाव किसी भी हालत में रूक नहीं सकते, समाज उसका रास्ता रोक नहीं सकता, परिवार उसके पैरों में बेडिया डाल नहीं सकता, वह तो हर हालत में आगे बढ़ कर गुरु चरणों मेर, मुझ में एकाकार होगा ही, क्योंकि यह एकाकार होना ही जीवन की पूर्णता है, और यदि ऐसा नहीं हो सका तो वह शिष्यता ही नहीं है, वह तो कायरता है, बुजदिली है, कमजोरी है, नपुंसकता है, और मुझे विश्वास है, कि मेरे शिष्यों के साथ इस प्रकार घिनौने शब्द नहीं जुड़ सकते ।

तुम्हारा अपना
निखिलेश्वरानंद

गुरु पूर्णिमा पर्व पर बोकारो में पूरा परिवार आपका स्वागत करने के लिए तत्पर है, हम उस साधना की गंगा में आत्म स्नान करेंगे, उस पवित्र मार्ग पर कुछ कदम बढाएंगे जो सिद्धाश्रम की ओर जाता है, वही तो जीवन का लक्ष्य है।
साधना कि शिविर कि जानकारी के लिए संपर्क करें -http://issp-shivirs.blogspot.com/

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

गुरु प्राप्ति - एक लक्ष्य

मनुष्य अपने आप में अधूरा और अपवित्र है। वह अपने आपको पूर्ण कहता है, मगर पूर्ण है नहीं, क्योंकि उसके जीवन में कोई न कोई अधूरापन रहता ही है, धन है तो प्रतिष्ठा नहीं, प्रतिष्ठा है तो पुत्र नहीं है, पुत्र है तो सौभाग्य नहीं, सौभाग्य है तो रोग रहित जीवन नहीं है। यदि आधुनिक विज्ञान के अनुसार मानव शरीर की चीड-फाड की जाय, तो उसमे से केवल मांस निकलेगा, हड्डिया निकलेगी, रूधिर निकलेगा, मल-मूत्र निकलेगा।

इसके अलावा शरीर के अन्दर कुछ ऐसी चीज नहीं है, जिससे की इस शरीर पर गर्व किया जा सके। हम भोजन करते हैं, वह भी मल बन जाता है। हम चाहे हलवा खायें, चाहे घी खाये, चाहे रोटी खायें, उसको परिवर्तित मल के रूप में ही होना है।

सामान्य मानव शरीर में ऐसी क्रिया नहीं होती, जो उसे दिव्य और चेतना युक्त बना सके और ऐसा शरीर अपने आपमें व्यर्थ है, खोकला है, उस देह में उच्चकोटि का ज्ञान, उच्चकोटि की चेतना समाहित नहीं हो सकती।

क्यो नहीं प्राप्त हो सकती? फिर मनुष्य योनि में जन्म लेने का अर्थ ही क्या रहा? जो पुष्प मल में पडा हुआ है, उसको उठा कर भगवान् के चरणों में नहीं चढाया जा सकता। यदि हम शरीर को भगवान् के या गुरु के चरणों में चढायें - हे भगवान्! हे गुरुदेव! यह शरीर आपके चरणों में समर्पित है, तो शरीर तो ख़ुद अपवित्र है, जिसमें मल और मूत्र के अलावा है ही कुछ नहीं। ऐसे गन्दे शरीर को भगवान् के चरणों में कैसे चढ़ा सकते हैं? ऐसे शरीर को अपने गुरु के चरणों में कैसे चढ़ा सकते हैं?

देवताओं का सारभूत अगर किसी में है, तो वह गुरु रूप में है, क्योंकि गुरु प्राणमय कोष में होता है, आत्ममय कोष मैं होता है। वह केवल मानव शरीर धारी नहीं होता। उसमे ज्ञान होता है, चेतना होती है, उसकी कुण्डलिनी जाग्रत होती है, उसका सहस्रार जाग्रत होता है। न उसे अन्न की जरूरत पड़ सकती है, न पानी की जरूरत हो सकती है, न तो उसे मूत्र त्याग की जरूरत होगी, न मल विसर्जन होगा। जब भूख-प्यास ही नहीं लगेगी, तो मल मूत्र विसर्जित करने की जरूरत हे नहीं होगी।

इसलिए उच्चकोटि के साधक न भोजन करते है, न पानी पीते हैं, न मल-मूत्र विसर्जन करते है, जमीन से छः फीट की ऊंचाई पर आसन लगाते हैं और साधना करते हैं। जो इस प्रकार की क्रिया करते हैं, वे सही अर्थों में मनुष्य है। जो इस प्रकार की क्रिया नहीं कर सकते, जो मलयुक्त हैं, जो गन्दगी युक्त हैं, वे मात्र पशु हैं।

इस जगह से उस जगह तक छलांग लगाने की कौन सी क्रिया है? कैसे वहां पहुंचा जा सकता है, जीवन में मनुष्य कैसे बना जा सकता है?

जीवन में वह स्थिति कब आएगी, जब जमीन से छः फूट ऊंचाई पर बैठ करके साधना कर सकेंगे? जमीन का ऐसा कोई सा भाग नहीं है, जहां रूधिर न बहा हो। धरती का प्रत्येक इंच और प्रत्येक कण अपने आप में रूधिर से सना हुआ है, अपवित्र है, उस भूमि में साधना कैसे हो सकती है।

बिना पवित्रता के उच्चकोटि की साधनाएं सम्पन्न नहीं हो सकती, हजारो वर्षों की आयु प्राप्त नहीं की जा सकती, सिद्धाश्रम नहीं पहुंचा जा सकता और जब नहीं पहुंचा जा सकता, तो ऐसा जीवन अपने आप में व्यर्थ है, किसी काम का नहीं हैं, वह सिर्फ श्मशान की यात्रा ही कर सकता है।

ऐसा जीवन तो आपकी पिछली अनेक पीढियां व्यतीत कर चुकी है और अब उनका नामोनिशान भी बचा नहीं है। आपको अपने दादा परदादा के सब नाम तो मालूम है, लेकिन यह नहीं मालूम, की आपके परदादा के पिता कौन थे, उन्होनें क्या कार्य किया और किस प्रकार उन्होनें अपना जीवन बिताया, यदि आप भी ऐसा ही करना चाहते है, तो फिर आपको जीवन में गुरु की कोई जरूरत ही नहीं है।

यह शरीर कितना अपवित्र है, की चार दिन भी बाहर के वातावरण को झेल नहीं सकता। यदि चार दिन स्नान नहीं करें, तो आपके शरीर से बदबू आने लगेगी, कोई आपके पास बैठना भी नहीं चाहेगा, बात भी करना नहीं चाहेगा। जबकि भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर से अष्टगंध प्रवाहित होती थी, उच्चकोटि के योगियों से अष्ठगंध प्रवाहित होती है।

तो आप में क्या कमी है, जो अष्टगंध प्रवाहित नहीं होती? आप जब निकले, तो दुनिया वाले मुड कर देखे, की पास में से कौन निकला? यह सुगंध कहां से आई, उसके व्यक्तित्व में क्या है?

... और यदि ऐसा व्यक्तित्व नहीं बना, तो जीवन का मूल अर्थ, मूल लक्ष्य नहीं प्राप्त हो सकता, जिसके लिए देवता भी इस पृथ्वी लोक पर जन्म लेने के लिए तरसते हैं। राम के रूप में जन्म लेते है, कृष्ण के रूप में जन्म लेते हैं, इसा मसीह के रूप में जन्म लेते हैं, पैगम्बर मोहम्मद के रूप में जन्म लेते हैं।

इस शरीर को पवित्र बनाने के लिए, यह आवश्यक है कि हम देह तत्व से प्राण तत्व में चले जायें। जब प्राण तत्व में जायेंगे, तो फिर देह तत्व का भान रहेगा ही नहीं।

फिर जीवन के साए क्रियाकलाप तो होंगे, मगर फिर मल-मूत्र की जरूरार नहीं रहेगी, फिर भोजन और प्यास की जरूरत नहीं रहेगी, फिर शून्य सिद्धि आसन लगा सकेंगे, फिर शरीर से सुगंध प्रवाहित हो सकेगी और एहसास हो सकेगा, कि आप कुछ है।

प्राण तत्व में जाकर आप में चेतना उत्पन्न हो सकेगी, अन्दर एक क्रियमाण पैदा हो सकेगा, सारे वेद सारे उपनिषद् कंठस्थ हो पायेंगे।

आप कितनी साधना करेंगे? कितना मंत्र जपेंगे? कब तक जपेंगे? ज्यादा से ज्यादा साठ साल की उम्र तक। सत्तर साल तक, लेकिन आपके जीवन का आधिकांश समय तो व्यतीत हो चुका है, जो बचा है, वह भी सामाजिक दायित्वों के बोझ से दबा हुआ है फिर वह जीवन अद्वितीय कैसे बन सकेगा? और अद्वितीय नहीं बना, तो फिर जीवन का अर्थ भी क्या रहा?

कृष्ण को कृष्ण के रूप में याद नहीं किया, कृष्ण तो जगत गुरु के रूप में याद किया जाता है। उनको गुरु क्यों कहा जाता है? इसलिए, की उन्होनें उन साधनाओं को, उस चेतना को प्राप्त किया, जिसके माध्यम से उनके शरीर से अष्टगंध प्रवाहित हुई, उनका प्राण तत्व जाग्रत हुआ।

मैं आपको एक द्वितीय साधना दे रहा हूं (गुरु हृदयस्थ स्थापन), हजार साल बाद भी आप इस साधना को अन्यत्र नहीं कर पायेंगे, पुस्तकों से आपको प्राप्त नहीं हो पायेगा, गंगा किनारे बैठ करके भी नहीं हो पायेगा, रोज-रोज गंगा में स्नान करने से भी नहीं प्राप्त हो पायेगा। यदि गंगा में स्नान करने से ही कोई उच्चता प्राप्त होती है, तो मछलियां तो उस जल में रहती है, वे अपने आप में बहूत उच्च बन जाती।

जीवन में अद्वितीयता हो, यह जीवन का धर्म है। हमारे जैसा कोई दूसरा हो ही नहीं। ऐसा हो, तब जीवन का अर्थ है। ऐसा जीवन प्राप्त करने के लिए बस एक ही उपाय है, की हम ऐसे गुरु की शरण में जायें, जो अपने आप में पूर्ण प्राणवान हों, तेजस्विता युक्त हों, वाणी में गंभीरता हो, आँख में तेज हो, वे जिस को देख लें, वह सम्मोहित हो, अपने आप में, सक्षम हो, और पूर्ण रूप से ज्ञाता हो।

... लेकिन आपके पास कोई कसौटी नहीं है, कोई मापदण्ड नहीं है। आप उनके पास बैठ कर उनके ज्ञान से, चेतना से, प्रवचन से एहसास कर सकते हैं। यदि आपको जीवन में सदगुरू की प्राप्ति हो गई, तो आपको जीवन का अर्थ समझ में आयेगा, तब आपको गर्व होगा, की आप एक सदगुरू के शिष्य है, जिनके पास हजारों हजारों पोथियों ज्ञान है।

यदि व्यक्ति में ज़रा भी समझदारी है, यदि उसमें समझदारी का एक कण भी है, तो पहले तो उसे यह चिंतन करना चाहिए, की उसे ऐसा जीवन जीना ही नहीं, जो मल-मूत्र युक्त है, क्योंकि ऐसे जीवन की कोई सार्थकता ही नहीं है और फिर उसे सदगुरू को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए, जो उसे तेजस्विता युक्त बना सके, जो उसे प्राण तत्व में ले जा सकें, जो उसके शरीर को सुगंध युक्त बना सके।

यदि ऐसा नहीं किया, तो भी यह शरीर रोग ग्रस्तता और वृद्धावस्था को ग्रहण करता हुआ मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। फिर वह क्षण कब आयेगा, जब आप दैदीप्यमान बन सकेंगे? कब आपमें भावना आएगी, कि मुझ को दैदीप्यमान बनना ही है, अद्वितीय बनाना ही हैं, सर्वश्रेष्ठ बनना है?

ऐसा तब सम्भव हो सकेगा, जब आपके प्राण, गुरु के प्राण से जुडेंगे, जब आपका चिंतन गुरुमय होगा, जब आपके क्रिया-कलाप गुरुमय होंगे और इसके लिए एक ही क्रिया है - अपने शरीर में पूर्णता के साथ गुरु को स्थापित कर देना है, जीवन में उतार देना।

शरीर में उनका स्थापन होते ही, उनकी चेतना के माध्यम से यह शरीर अपने आप में सुगन्ध युक्त, अत्यन्त दैदीप्यमान और तेजस्वी बन सकेगा, जीवन में अद्वितीयता और श्रेष्ठता प्राप्त हो सकेगी, जीवन में पवित्रता आ सकेगी, प्राण तत्व की यात्रा सम्भव हो सकेगी और उनका ज्ञान आपके अन्दर उतर कर सकेगा।
- सदगुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

सर्वोच्च अनुभूति

अनुभूतियों की बात कितनी भी करें...

परन्तु जब बछडा दौड़ कर अपनी माँ के थन से दूध पीने लगता है, तो उसे क्या अनुभूति होती है ?

जब गौरैया का छोटा सा बच्चा अपनी माँ के डैनों में दुबक कर अपने को सुरक्षित महसूस करने लग जाता है, तो उसे क्या अनुभूति होती है ?

और जब शिष्य गुरु चरणों में पहुँच कर अपने आप में आत्म-विभोर हो जाता है, तो उसे क्या अनुभूति होती है?

क्या इसे शब्दों में बांधा जा सकता है?

क्या इसे किसी मापदण्ड पर नापना संभव है?

जिसने गुरु प्रेम में अपने को रंग लिया, उसे इससे बड़ी अनुभूती और कौन सी चाहिए?

गुरुदेव की एक प्यार भरी नजर के सामने सभी अनुभूतियां बौनी है, क्योंकि सदगुरु की एक नजर के लिए तो देवता भी तरसते हैं। यही सर्वोच्च अनुभूति है।

मेरे सदगुरुदेव निखिल तो वह शक्ति है, जो मुझे निरन्तर शाश्वत रूप से चेतना देते रहते हैं, जो अपने शांत स्वरूप के अनुरूप शांति प्रदान करते हैं। जो आकाश से भी परे हैं, अर्थात किसी लोक में स्थित न होकर के अपने शिष्यों के ह्रदय में स्थित है, जिन्हें किसी बिन्दु द्वारा, किसी कला द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका स्वरुप तो शिष्यों के तेज के में व्याप्त है। ऐसे ही प्रिय सदगुरुदेव मेरे निखिल हैं।

जो परम तत्व को बोध करने वाले हैं, जिनके जीवन में आने से अंधकार, आर्ट, विषाद समाप्त हो जाते हैं, और मन में परम तत्व का परमानन्द जाता है और जो हर समय यही कहते हैं -

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णं मेवाव शिष्यते ॥


अर्थात जो स्वयं तो पूर्ण हैं ही, अपने शिष्य को भी पूर्णता प्रदान करते हुए उसे सम्पूर्ण अर्थात पूर्णतायुक्त व्यक्ति बनाते है, जो शिष्य रुपी श्रेष्ठ रचना का निर्माण करते हैं, वे ही तो मेरे प्रिय सदगुरुदेव निखिल हैं, जिनके बारे में केवल इतना ही कहा जा सकता है -

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुच्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्व मम देव देव ॥


गुरुवार, 20 नवंबर 2008

आर्य संस्कृति के रक्षक

प्रिया आत्मीय बंधुओं,

समय का चक्र अपनी गति से चलता रहता है। उस गति में हर क्षण नित्य नवीन होता है। पुराने क्षण से अलग कुछ नया करने का आह्वान करता है। जीवन को लम्बी यात्रा न मानकर क्षण-क्षण जीने में ही आनन्द है और जो जीवन को भार समझाते हैं, यह कि जीवन में केवल बाधाएं और परेशानियां ही हैं तो उनके लिए यह भार बढ़ता ही जाता है। जो साधक है, जो शिष्य है वह अपने मन से एक-एक कर भार का बोझ फेकता रहता है। अपने मार्ग में आने वाले कांटे पत्थरों को स्वयं हटाता है। स्वयं के प्रयत्नों से इस यात्रा में एक विशेष आनन्द की अनुभूति होती है। इस आनन्द में पूर्ण आत्म साक्षात्कार कराने हेतु सदगुरुदेव हर समय ह्रदय में विराजमान रहते ही हैं, केवल आवश्यकता इस बात की है की हम मन मंथन हर समय करते रहे। अपने आप को समय के तराजू पर तोलते रहें, समाज आवश्यक है लेकिन समाज की चिंताओं में इतना भी अधिक जकड नहीं जाएं कि समाज हमारे मन पर हावी हो जाएं।

जीवन के अज्ञान अंधकार को मिटाने के लिए यह आवश्यक है कि हमें अपने अन्दर विखण्डन प्रक्रिया प्रारम्भ करनी ही पड़ेगी। इसके लिए कोई समय मूहूर्त की आवश्यकता नहीं है। सदगुरुदेव कहते हैं कि जीवन का आधार विचार, विवेक और वैराग्य है। साधक का प्रथम कर्तव्य विचारशील होना है और यह विचार विवेक से युक्त होने चाहिए। लाखों प्रकार की बातें हम सुनते हैं, लाखों प्रकार के मंत्र हैं, लाखों प्रकार के अन्य कार्य हैं, लाखों प्रकार के मोह है। लेकिन जब हम अपने विवेक स्थान, जिसका प्रारम्भ ह्रदय से है, जिसका भाव आज्ञा चक्र मस्तिष्क में है उस विवेक स्थान पर सदगुरुदेव स्थापित हो जाएं तो श्रेष्ठ विचार ही उत्पन्न होते हैं। विचार ही महाशक्ति है, विचार ही आद्या दुर्गा शक्ति है, महाकाली है, महाविद्याएं है, विचार ही भाग्य का निर्माण करती है। विचार का तात्पर्य है संकल्प और चिंतन। जब चिंतन के साथ संकल्प प्रारम्भ होता है तो जीवन की समस्याएं लघु लगने लगती हैं और इसी से जीवन में एक निःस्पृह योगी का भाव आता है। आप साधक है, शिष्य है और शक्ति के उपासक हैं। सदगुरुदेव रूपी शिव आपके साथ है फिर जीवन में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

जब हम गुरु से मिलते है तो हमारा नया जन्म होता है और जीवन का हर क्षण एक उज्जवल भविष्य की सम्भावना लेकर आता है। हर घड़ी एक महान मोड़ का समय हो सकती है। क्या पता जिस क्षण को हम समझकर बरबाद कर रहे हैं, वही हमारे लिए अपनी झोली में सुंदर सौभाग्य की सफलता लाया हो। समय की चूक पश्चाताप की हूक बन जाती है। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वालों को चाहिए कि वे अपने किसी भी ऐसे कर्तव्य को भूलकर भी कलपर न टालें, जो आज किया जाना चाहिए। आज के मन के लिए आज का ही दिन निश्चित है और हमें हर समय वर्त्तमान में ही जीवन जीना है।

गुरुदेव चाहे तो एक क्षण में वरदान देकर जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं लेकिन गुरुदेव तो जीवन को तपाते है, साधक में अग्नि तत्व का संचार करते हैं और जब यह अग्नि तत्व संचालित हो जाता है तो साधक आत्म ज्ञान का पहला अध्याय पूरा करता है। इसलिए सदगुरुदेव सदैव संस्कृति और संस्कार पर बल देते हैं। संस्कार एक दिन में ही जाग्रत हो जाते हैं इसे बदलने के लिए मन के हजार-हजार बंधनों को तोड़ना पङता हैं।

जब नदी कई धाराओं में बट जाती है तो वह नदी न बनकर एक नहर बन जाती है और नहरें समुद्र को पा नहीं सकती हैं। वे छोटे-छोटे टुकडों में बटी हुई अपने अस्तित्व को समाप्त कर देती हैं और केवल स्थान भर के लिए थोडी उपयोगी रह जाती है। शिष्य भी नदी की तरह ही जब वह ज्ञान के मार्ग पर जीवन की यात्रा करता है तो उसमें दृढ़ निश्चय संकल्प होना आवश्यक है क्योंकि उसका लक्ष्य यह होना चाहिए कि मुझे अपने सागर रुपी गुरु से मिलना है। गुरु ही विराट है उसी में अपने अस्तित्व का मिलन करना है।

सिद्धाश्रम साधक परिवार की इस यात्रा में जब मैं कई शिष्यों को अपने मार्ग से थोडा भटकते हुए देखता हूं आश्चर्य होता है मन व्यथित होता है, जब लोगों को सदगुरु के नाम पर ढोंग करने वाले शिष्यों के सामने नमन करते देखता हूं, जब कुछ शिष्यों को क्षणिक, भौतिक सुविधाओं के लिए ऐसे लोगों के पास भटकते देखता हूं जो उन्हें जीवन की सारी भौतिक बाधाओं को पूर्ण करने का छलावा दिखाते हैं। कोई तथाकथित गुरु गडा धन बताने की बात करता है तो कोई तथाकथित गुरु भूत-प्रेत भगाने का दावा करता है तो कोई मां काली के दर्शन कराने का भ्रम दिखाता है। इन छोटे-छोटे स्थानिक गुरुओं को देखकर आश्चर्य होता है कि सदगुरु के शिष्य ऐसे भ्रम में कैसे पड़ जाते हैं? और मेरे सामने इनका उत्तर ना मिलने पर सदगुरुदेव निखिल के सामने बैठकर प्रार्थना करता हूं कि हे! गुरुदेव यह कैसी लीला है तो गुरुदेव कहते हैं कि चिंता करने की कोई बात नहीं है घासफूस, खतपतवार, मौसमी फल थोड़े समय के लिए सबको अच्छे लगते हैं लेकिन खतपतवार, मौसमी फल-फूल का जीवन स्थाई नहीं रहता। जो शिष्य इन मार्गों पर जा रहे हैं वे वापस सिद्धाश्रम की मुख्य धारा में अवश्य आयेंगे।

इसलिए मुझे आज यह उदघोष करना है कि आप सिद्धाश्रम साधक परिवार के प्रहरी हैं। सदगुरुदेव के मानस पुत्र हैं, दीक्षा प्राप्त शिष्य हैं, आर्य संस्र्कुती के रक्षक हैं तो आपका यह कर्तव्य कि सदगुरुदेव के नाम पर पड़ने वाली इस खतपतवार को समाप्त कर दें। इन ढोंगियों को ऐसी सजा दे कि पूरा समाज देख सके और पत्थर और हीरे में अनुभव अन्तर कर सकें। कृत्रिम चमक कुछ समय के लिए लुभा सकती है लेकिन हीरा तो हीरा ही है। हमारे सदगुरुदेव तो हीरे से भी अधिक मूल्यवान, सागर से भी
विशाल, हिमालय से भी उंचे, शिवरूपी निखिल हैं और जिन्हें प्राप्त करना सहज है।

इसी उद्देश्य से यह अंक भगवती मां दुर्गा को समर्पित है, महाविद्याओं को समर्पित है जिनकी साधना आराधना कर हम जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकते हैं।

इस बार बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में फिर महाशिवरात्रि पर्व "हर-हर महादेव" का उदघोष करेंगे। शिव और शक्ति से अपने जीवन को भर देंगे क्योंकि हमारा एक ही मूल सुत्र है -


एकोही नामं एकोहि कार्यं, एकोहि ध्यानं एकोहि ज्ञानं ।
आज्ञा सदैवं परिपालयन्ति; त्वमेवं शरण्यं त्वमेव शरण्यं ॥

आपका अपना
नन्द किशोर श्रीमाली
मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान पत्रिका , फरवरी 2006

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

शक्तिपात

गुरु गति पार लगावें

क्योंकि गुरु ही देते है तंत्र का ज्ञान

और माध्यम है

शक्तिपात

तंत्र कोई मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन आदि को नहीं कहते, अपितु सुव्यवस्थित (systematic) ढंग से किसी कार्य को सम्पादित करने की एक प्रणाली को तंत्र (system) कहते है। तंत्र की इस सुव्यवस्थित प्रणाली के अन्तर्गत शक्ति तत्व की अनिवार्यता को आरम्भ से ही श्रेष्ठ गुरुओं ने अनुभव किया, इसलिए दीक्षा जैसी क्रियाओं का वर्णन शास्त्रों में मिलता है -

दीक्षाग्निदग्धासौ मायाविच्छिन्नबन्धने ।
गतस्तय कर्मबन्ध निर्जीवस्तु शिवो भवेत् ॥

ज्ञान की परम्परा को अक्षुण्ण रखने के लिए शक्ति गुरुजनों के शिष्यों के अन्तः में ज्यों की त्यों स्थापित करने के लिए दीक्षा जैसी प्रक्रिया का प्रतिपादन किया, 'शक्तिपात' जैसी क्रिया को विकसित किया। शक्तिपात जैसी सुव्यवस्थित (तंत्रमय) क्रिया स्वतः ही प्रमाण है, इस बात कि शक्ति तत्व का कितना अधिक महत्त्व है तंत्र साधनाओं में।

'शक्तिपात' में गुरु अपनी शक्ति को साधक में स्थापित कर उसको शक्तिसंपन्न बना देते है, जिससे वह स्वयं साधनाओं के क्षेत्र में बढ़ कर सफल हो सके, वह प्राप्त कर सके जो उसका अभीष्ट है। आज भी जो श्रेष्ठ साधक है, वे योग्य गुरु से समय-समय पर शक्तिपात करते हुए तंत्र के क्षेत्र में, साधनाओं के क्षेत्र में एक-एक कदम आगे बढ़ते रहते है।

बिना दीक्षा के समस्त साधना कर्म व्यर्थ है, इसके कहने के पीछे मन्तव्य यहीं है, कि तंत्र में शक्ति की अनिवार्यता निर्विवाद है और 'शक्तिपात' तंत्र के शक्ति तत्व के महत्त्व को दर्शाता हुआ सुन्दरतम निरूपण है, जो आज भी पूज्यपाद गुरुदेव की परम्परा में मुमुक्षओं को उपलब्ध है।

- मंत्र-तंत्र-यंत्र पत्रिका, नवम्बर २००७

गुरुवार, 31 जुलाई 2008

क्या आप ऐसे शिष्य है

शिष्य द्वारा अपने ह्रदय में गुरु को धारण करना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु यह तो प्रारम्भ मात्र है, जैसा कि एक बार पूज्य गुरुदेव ने कहा था -

'यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, कि गुरु को कितने शिष्य याद करते है? यह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं है, कि 'गुरु' शब्द को कितने शिष्यों ने अपने ह्रदय-पटल पर अंकित किया है? यह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं है, कि कितने शिष्य गुरु सेवा करने की कामना अपने दिल में रखते है? यह भी उतना महत्वपूर्ण नहीं है, कि कितने शिष्य गुरु की प्रसन्नता हेतु सचेष्ट हैं?'

- 'अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह है, कि गुरु कितने शिष्यों को याद करते है'
- 'अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह है, कि गुरु के होठों पर कितने शिष्यों का नाम आता है'
- 'अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह है, कि कितने शिष्यों के नाम गुरु के ह्रदय पटल पर खुदे हुए है'
- 'अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह है, कि गुरु ने किसी शिष्य की सेवा स्वीकार की है'
- 'अपितु अत्यधिक महत्वपूर्ण यह है, कि गुरु किस शिष्य पर प्रसन्न हुए है'


और गुरु के होठों पर शिष्य का नाम उच्चरित हो, गुरु के ह्रदय पटल पर शिष्य का नाम अंकित हो, गुरु सेवा का अवसर प्राप्त हो तथा शिष्य के कार्यों से गुरु प्रसन्न हो, यह शिष्य-जीवन का परम सौभाग्य है तथा प्रत्येक शिष्य की यही प्राथमिक इच्छा होती है। जिस शिष्य को ऐसा दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त होता है, वह देव तुल्य हो जाता है, उसके जीवन से सभी पाप, दुःख, पीडा समस्याएं आदि दूर हो जाती हैं, अणिमादि सिद्धियां उसके सामने नृत्य करती है, उसका व्यक्तित्व करोड़ों सूर्यों से भी ज्यादा तेजस्वी हो जाता है। गुरु-सेवा, कोई आवश्यक नहीं है, कि शारीरिक रूप से गुरु गृह में रहकर ही संपन्न की जाय, अपितु महत्वपूर्ण गुरु-सेवा यह है, कि शिष्य कितना अधिक गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान से लोगों को लाभान्वित करता है तथा कितने अधिक लोगों को गुरु से जोड़ने का कार्य करता है, निःस्वार्थ, निष्कपट भाव से, लेकिन दोनों ही सेवाएं निस्वार्थ भाव से होनी चाहिए।

गुरुवार, 3 जुलाई 2008

समुद्र में अभी इतना जल नहीं है कि ...

गुरु पूर्णिमा, संवत वि. २०५६
मेरे परम आत्मीय पुत्रों,

तुम क्यो निराश हो जाते हो, मुझे न पाकर बीच? मगर मैं तो तुम्हारे बिल्कुल बीच ही हूं, क्या तुमने अपने ह्रदय की आवाज को ध्यान से कान लगाकर नहीं सूना है?

शायद नहीं भी सुन पा रहे होगे ... और मुझे मालुम था, कि एक दिन यह स्थिति आएगी, इसलिए ये पत्र मैंने पहले ही लिख कर रख दिया था, कि अगली गुरु पूर्णिमा में शिष्यों के लिए पत्रिका में दिया जा सके। ... परन्तु मैं तुमसे दूर हुआ ही कहां हूं। तुमको लगता है की मैं चला गया हूं, परन्तु एक बार फिर अपने ह्र्दय को ठहोक कर देखो, पुछ कर देखो तो सही एक बार कि क्या वास्तम में सदगुरुदेव चले गए हैं? ऐसा हो ही नहीं सकता, कि तुम्हारा ह्रदय इस बातों को मान ले, क्योंकि उस ह्रदय में मैंने प्राण भरे है, मैंने उसे सींचा है ख़ुद अपने रक्त कणों से। तो फिर उसमें से ऐसी आवाज भला आ भी कैसे सकेगी?

जिसे तुम अपना समझ रहे हो, वह शरीर तो तुम्हारा है ही नहीं, और जब तुम हो ही नहीं, तो फिर तुम्हारा जो ये शरीर है, जो ह्रदय है, तुम्हारी आंखों में छलछलाते जो अश्रुकण हैं, वो मैं ही नहीं हूं तो और कौन हैं? तुम्हारे अन्दर ही तो बैठा हूं मैं, इस बात को तुम समझ नहीं पाते हो, और कभी कभी समझ भी लेते हो, परन्तु दुसरे व्यक्ति अवश्य ही इस बात को समझते हैं, अनुभव करते हैं, कि कुछ विशेष तुम्हारे अन्दर है जरूर, और वह विशेष मैं ही तो हूं, जो तुममें हूं।

... और फिर अभी तो मेरे काफी कार्य शेष पड़ें हैं, इसलिए तो अपने खून से सींचा है तुम सींच कर अपनी तपस्या को तुममें डालकर तैयार किया है तुम सब को, उन कार्यों को तुम्हें ही तो पूर्णता देनी है। मेरे कार्यों को मेरे ही तो मानस पुत्र परिणाम दे सकतें हैं, अन्य किसमें वह पात्रता है, अन्य किसी में वह सामर्थ्य हो भी नहीं सकता, क्योंकि वह योग्यता मैंने अन्य को दी भी तो नहीं है?

उस नित्य लीला विहारिणी का एक कार्य मुझसे कराना था, इसलिए देह का अवलम्बन लेकर मैं उपस्थित हुआ तुम्हारे मध्य। ... और वह कारण था - तुम्हारा निर्माण! तुमको गढ़ना था और जब मुझे विश्वास हो गया कि अपने मानस पुत्रों को ऊर्जा प्रदान कर दी हैं, चेतना प्रदान कर दी है, उन्हें तैयार कर दिया है, तो मेरे कार्य का वह भाग समाप्त हो गया, परन्तु अभी तो मेरे अवशिष्ट कार्यों को पूर्णता नहीं मिल पाई है, वे सब मैंने तुम्हारे मजबूत कन्धों पर छोड़ दिया है। ये कौन से कार्य तुम्हें कभी करने हैं, किस प्रकार से करने हैं, इसके संकेत तुम्हें मिलते रहेंगे।

तुम्हें तो प्रचंड दावानल बनकर समाज में व्याप्त अविश्वास, अज्ञानता, कुतर्क, पाखण्ड, ढोंग और मिथ्या अंहकार के खाण्डव वन को जलाकर राख कर देना है। और उन्हीं में कुछ ज्ञान के पिपासु भी होंगे, सज्जन भी होंगे, हो सकता है वे कष्टों से ग्रस्त हों, परन्तु उनमे ह्रदय हो और वे ह्रदय की भाषा को समझते हों, तो ऐसे लोगों पर प्रेम बनकर भी तुम बरस जाना। और गुरुदेव का संदेश देकर उन्हें भी प्रेम का एक मेघ बना देना।

फिर वो दिन दूर नहीं होगा जब इस धरती पर प्रेम के ही बादल बरसा करेंगे, और उन जल बूंदों से जो पौधे पनपेंगी, उस हरियाली से भारत वर्ष झूम उठेगा। फिर हिमालय का एक छोटा सा भू-भाग ही नहीं पूरा भारत ही सिद्धाश्रम बन जाएगा, और पूरा भारत ही क्यों, पूरा विश्व ही सिद्धाश्रम बन सकेगा।

कौन कहता है, कि यह सम्भव नहीं है? एक अकेला मेघ खण्ड नहीं कर सकता यह सब, पूरी धरती को एक अकेला मेघ खण्ड नहीं सींच सकता अपनी पावन फुहारों से ... परन्तु जब तुम सभी मेघ खण्ड बनकर एक साथ उडोगे, तो उस स्थान पर जहां प्रचण्ड धूप में धरती झुलस रही होगी, वहां पर बरसोगे तो एकदम से वहां का मौसम बदल जायेगा।

'अल्फांसो' अव्वल दर्जे के आम होते हैं, उन्हें भारत में नहीं रखा जाता, उन्हें तो विदेशों में भेज दिया जाता हैं, निर्यात कर दिया जाता है, और बाहर विदेशों में इन्ही आमों से भारत की छवि बनती है। तुम भी अव्वल दर्जे के मेरे शिष्य हो, तुम्हें भी फैल जाना है, मेरे प्रतिनिधि बनकर और मेरी सुगन्ध को बिखेर देना है, सुवासित आर देना है पुरे विश्व को, उस गंध से, जिसको तुमने एहसास किया है।

गुरु नानक एक गांव में गए, उस गांव के लोगों ने उनका खूब सेवा सत्कार किया। जब वे गांव से प्रस्थान करने लगे, तो गांव के सब लोग उनको विदाई देने के लिए एकत्र गुए। वे सब गुरूजी के आगे हाथ जोड़कर और शीश झुकाकर खड़े हो गए। नानक ने कहा- 'आप सब बड़े नेक है और उपकारी हैं, इसलिए आपका गांव उजड़ जाएं।

इस प्रकार आशीर्वाद देकर आगे चल दिए और एक दुसरे गांव के लोगों ने गुरु नानक के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। नानक जी ने वहां से प्रस्थान करते समय वहां के लोगों को आशीर्वाद देते हुए कहा - 'तुम्हारा गांव और तुम सदा बसे रहो।' मरदाना जो उनका सेवक था, उसने नानक से पूछा - 'आपने अच्छे लोगों को बुरा और बुरे लोगों को अच्छा आशीर्वाद दिया, ऐसा क्यों?'

नानक मुस्कुराए और बोले - 'तुम इस बात को नहीं समझे, तो सुनो, जो लोग बुरे हैं, उन्हें एक ही स्थान पर बने रहना चाहिए, जिससे वे अपनी बुराई से दूसरों को हानि नहीं पहुंचा सकें। परन्तु जो लोग अच्छे हैं उन्हें एक जगह नहीं रहना चाहिए। उन्हें सब जगह फैल जाना चाहिए, जिससे उनके गुण और आदर्श दुसरे लोग भी सीखें और अपना सकें।'

इसलिए में तुम्हे कह रहां हूं, कि तुम्हे किसी एक जगह ठहर कर नहीं रहना है, तुम्हे तो गतिशील रहना है, खलखल बहती नदी की तरह, जिससे तुम्हारे जल से कई और भी प्यास बुझा सकें, क्योंकि वह जल तुम्हारा नहीं है, वह तो मेरा दिया हुआ है। इसलिए तुम्हे फैल जाना है पूरे भारत में, पुरे विश्व में ...

... और यूं ही निकल पड़ना घर से निहत्थे एक दिन प्रातः को नित्य के कार्यों को एक तरफ रख कर, हाथ में दस-बीस पत्रिकाएं लेकर ... और घर वापिस तभी लौटना जब उन पत्रिकाओं को किसी सुपात्र के हाथों में अर्पित कर तुमने यह समझ लिया हो, कि वह तुम्हारे सदगुरुदेव का और उनके इस ज्ञान का अवश्य ही सम्मान करेगा।

... और फिर देख लेना कैसे नहीं सदगुरुदेव की कृपा बरसती है। तुम उसमें इतने अधिक भीग जाओगे, कि तुम्हें अपनी सुध ही नहीं रहेगी।

एक बार बगावत करके तो देखो, एक बार अपने अन्दर तूफान तो लाकर देखो। देखो तो सही एक बार गुरुदेव का हाथ बनकर। फिर तुम्हें ख़ुद कुछ करना भी नहीं पडेगा। सब कुछ स्वतः ही होता चला जाएगा। पर पहला कदम तो तुम्हें उठाना ही होगा, एक बार प्रयास तो करना ही होगा। निकल के देखो तो सही घर के बन्द दरवाजों से बाहर समाज में और फैल जाओ तुम बुद्ध के श्रमणों की तरह पुरे भारत वर्ष में और पुरे विश्व में भी।

फिर देखना कैसे नहीं गुरुदेव का वरद हस्त तुम्हें अपने सर पर अनुभव होता है। और छोटी समस्याओं से डरना नहीं, घबराना नहीं। समुद्र में अभी इतना जल नहीं है, कि वह निखिलेश्वरानन्द के शिष्यों को डुबा सके। क्योंकि तुम्हारे पीछे मैं हमेशा से ही खडा हूं और रहूंगा भी।

तुम मुझसे न कभी अलग थे, और न ही हो सकते हो। दीपक की लौ से प्रकाश को अलग नहीं किया जा सकता और न ही किया जा सकता है पृथक सूर्य की किरणों को सूर्य से ही। तुम तो मेरी किरणें हो, मेरा प्रकाश हो, मेरा सृजन हो, मेरी कृति हो, मेरी कल्पना हो, तुमसे भला मैं कैसे अलग हो सकता हूं।

'तुम भी तो ... ' (जुलै-९८ के अंक में मैंने तुम्हें पात्र दिया था यही तो उसका शीर्षक था) लेकिन अब 'तुम भी तो' नहीं वरन 'तुम ही तो' मेरे हाथ पैर हो, और फिर कौन कहता है, कि मैं शरीर रूप में उपस्थित नहीं हूं। मैं तो अब पहले से भी अधिक उपस्थित हूं। और अभी तुम्हें इसका एहसास शायद नहीं भी हो, कि मेरा तुमसे कितना अटूट सम्बन्ध है, क्योंकि अभी तो मैंने इस बात का तुम्हें पूरी तरह एहसास होने भी तो नहीं दिया है।

पर वो दिन अवश्य आयेगा, जब तुम रोम-रोम में अपने गुरुदेव को, माताजी को अनुभव कर सकोगे, शीघ्र ही आ सके, इसी प्रयास में हूं, और शीघ्र ही आएगा।

मैंने तुम्हें बहुत प्यार से, प्रेम से पाला-पोसा है, कभी भी निखिलेश्वरानन्द की कठोर कसौटी पर तुम्हारी परीक्षा नहीं ली हैं, हर बार नारायण दत्त श्रीमाली बन कर ही उपस्थित हुआ हूं, तुम्हारे मध्य। और परीक्षा नहीं ली, तो इसलिए कि तुम इस प्यार को भुला न सको, और न ही भुला सको इस परिवार को जो तुम्हारे ही गुरु भाई-बहनों का है, तुम्हें उसी परिवार में प्रेम से रहना हैं।

समय आने पर, यह तो मेरा कार्य है, मैं तुम्हे गड़ता चला जाउंगा, और मैंने जो-जो वायदे तुमसे किए हैं, उन्हें मैं किसी भी पल भूला नहीं हूं, तुम उन सब वायदों को अपने ही नेत्रों से अपने सामने साकार होते तुम देखते जाओंगे। तुम्हारे नेत्रों में प्रेमाश्रुओं के अलावा और किसी सिद्धि की चाह बचेगी ही नहीं, क्योंकि मेरा सब कुछ तो तुम्हारा हो चुका होगा, क्योंकि 'तुम तो हो मेरे हो'।

- सदा की ही भांती स्नेहयुक्त आशीर्वाद,
- तुम्हारा गुरुदेव,
नारायण दत्त श्रीमाली

बुधवार, 4 जून 2008

जीवन का उद्देश्य

जीवन का एक उद्देश्य होता है, और वह यह कि उस ज्ञान को प्राप्त करें कि मेरा जन्म क्यों हुआ है? यह चिन्तन पशु-पक्षी, कीट पतंग में नहीं हो सकता। जन्म लेने कि क्रिया तो देवताओं में भी नहीं है। इसलिए मनुष्य जन्म को ब्रह्माण्ड की एक सर्वश्रेष्ठ क्रिया कहा गया है। परन्तु जन्म के पहले ही क्षण से तुम्हारी क्रिया श्मशान की ओर जाने की क्रिया हो जाती है। जैसे-जैसे एक-एक पल बीतता जाता है, तुम मृत्यु के और अधिक निकट होते जाते हो, और मृत्यु की यह क्रिया पशुओं में भी होती है।

परन्तु फिर तुममे और पशुओं में क्या अन्तर है? अन्तर यह है कि तुम इस रहस्य को ज्ञात कर सकते हो की प्रभु ने तुम्हे जीवन क्यों दिया है, जीवन का लक्ष्य क्या है? जीवन का लक्ष्य पूर्णता कि ओर अग्रसर होना है। और जो अपने जीवन में पूर्णता की ओर अग्रसर होने की क्रिया करता है, सोचता है, चिन्तन करता है, उसी का जीवन सार्थक है और यह सार्थकता तब हो सकती है, जब जीवन में पुण्यों का उदय हो ओर श्रेष्ठ गुरु मिल सकें।

और यदि जीवन में ऐसा कोई क्षण आए और हम गुरु को पहिचान लें, उनके चरणों को पकड़ लें - वह जीवन है। गुरु ने जन्म लिया है और जन्म लेकर पूर्णता प्राप्त की है, वे ही समझा सकते है, कि जीवन को कैसे पूर्णता दी जा सकती है।

जीवन के श्रेष्ठता तो आखों में, जीवन में रोम-रोम में और प्रत्येक अणु-अणु में एक आनंद, एक मस्ती एक हिलोर भर देना है, इसलिए मैं तुम्हे उस सागर में हिचकोले खाने की क्रिया सिखा रहा हूं जहां श्रेष्ठता है, जहां मस्ती है, जहां सुख है। और जीवन की इस यात्रा का प्रारम्भ जहां मनुष्य जन्म से है, वही अंत इष्ट से साक्षात्कार में है। यह रास्ता आनन्दप्रद है, यह रास्ता मधुरता का है, श्रेष्ठता का है। यह जीवन की प्रफुल्लता का है और सबसे बड़ी बात है की प्रेम के माध्यम से जीवन के अणु-अणु, जीवन के कण-कण और जीवन के रोम-रोम, जीवन के प्रत्येक कार्य में आनंद का अहसास आ जाता है, एक सुगंध और तरंग आ जाती है।
- सदगुरुदेव

रविवार, 20 जनवरी 2008

यदि हमें अवसर मिलता

यह वाक्य अक्सर लोगों के द्वारा सुनने को मिल जाता है

वे कहते हैं -

यदि हमें अवसर मिला होता, तो आज हम यह कर लेते, आज हम वह बन जाते, आज हमारी यह स्थिति नहीं होती। तुम क्या जानो, मुझमें कितनी योग्यता है, कितनी क्षमता है, लेकिन दुर्भाग्य से हमें अवसर ही नहीं प्राप्त हो पाया।

यथार्थ में देखा जाय, तो यह कहना उचित और न्यायसंगत नहीं है। इन वाक्यों के द्वारा हम केवल अपनी अकर्मण्यता को छिपाने का प्रयास ही करते हैं, अपनी कायरता को छिपाने के लिए ढाल के रुप में ही इन शब्दों का प्रयोग करते हैं। अवसर तो सदैव से हमारे जीवन में आते ही रहते है, लेकिन हम उन्हें पहिचान नहीं पाते, उनका उपयोग नहीं कर पाते और बाद में पश्चाताप करते रहते है, अपने दोष दूसरों पर मढ़ते रहते हैं।

इसका मूल कारण यही है, कि हम अपने ऋषियों कि, अपने पूर्वजों कि गौरवशाली परम्पराओं को भूल कर अंधी भौतिकता कि दौड़ में उलझ रहे, वासनात्मक जगत में लिप्त रहे। हमने अपनी प्राचीन विद्याओं को जानने और जीवन में उतारने का प्रयत्न ही नहीं किया। फलत: हम उस पौरुष से अनाभिज्ञ रहे, जिसके द्वारा विश्वामित्र ने लक्ष्मी को अपने घर में कैद कर दिया था, एक नयी सृष्टि का निर्माण प्रारंभ कर दियां था, जिसके बल पर शंकराचार्य ने एक गरीब ब्राह्मणी के घर स्वर्ण वर्षा करा दी थी इन शब्दों को कहना हमारी लिजलिजी मानसिकता का ही प्रतीक है।

सम्पूर्ण जीवन को इस मानसिकता से मुक्त करने का एक छोटा सा प्रयास मन्त्र-तंत्र-यंत्र पत्रिका अपने पन्नों के माध्यम से सम्पन्न कर रही है, जिससे कि हम स्वशक्ति से युक्त हो सकें, हम स्वयं अपने भाग्य का निर्माण कर सकें और अपने महान ऋषियों के गौरवशाली पथ का अनुसरण कर सम्पूर्णता, श्रेष्ठता व अद्वितीयता प्राप्त कर सकें और पूरी दुनिया को दिखा सकें, कि हमारे पूर्वज कितने श्रेष्ट, कितने बडे वैज्ञानिक है और उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त कितने उच्चकोटि के हैं।

आपका
नन्दकिशोर श्रीमाली