गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009

महालक्ष्मी आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निसी दिन सेवत, हर विष्णु धाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता ...

उमा, रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता ।
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता ...

दुर्गा रूप निरंजनि, सुख संपत्ति दाता ।
जो कोई तुमको ध्याता, रिधि सिधि धन पाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता ...

तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभ दाता ।
कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भव निधि की त्राता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता ...

जिस घर तुम रहती तहं, सदगुण आता ।
सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता ...

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता ।
खान पान का वैभव सब तुमसे आता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता ...

शुभ गुण मन्दिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहिं पाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता ...

महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता ।
आ आनन्द समाता, पाप उतर जाता ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता ...


- मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान अक्टूबर २००८

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

शंकराचार्य विचारित - लक्ष्योत्तमा साधना

आदिगुरू शंकराचार्य के सम्बन्ध में हजारों कथाएं हैं उनमें से कुछ कथाएं उनके शिष्यों, भक्तों के अनुभव के आधार पर रचित की गई। इन सब कथाओं के सार में एक बात पूर्ण रूप से स्पष्ट होती है कि शंकराचार्य ने अपनी जीवन यात्रा में योगियों, यतियों और सन्यासियों से ज्ञान ग्रहण किया। ओंकारेश्वर में अपने गुरु गोविन्द्पादाचार्यसे दीक्षा प्राप्त कर उनके आर्शीवाद से आगे की यात्रा को निकल पड़े। धन के नाम भिक्षा का खाली झोला सा लेकिन दिमाग साधनाओं, मंत्र-तंत्र से भरपूर। उन्होनें अपने जीवन यात्रा में एक गरीब ब्राह्मणी के घर साधना प्रयोग कर धन प्रदान (जिसे कालांतर में धन वर्षा कहा गया) किया और आगे की यात्रा में निकल पड़े थे।

इसके मूल में अनेक रहस्य उदघाटित होते होते है, संभवतः उन सबका विवेचन करना तो सम्भव नहीं हैं, परन्तु मूल विषय है, कि क्या स्तुति के माध्यम से धनवर्षा सम्भव है या शंकराचार्य ने किस मार्ग को अपनाया, कि वे लक्ष्मी को आबद्ध कर इच्छित स्थान पर धनवर्षा कराने में सक्षम हो सके?

इस प्रश्न का उत्तर यहीं है, कि मात्र स्तुति के माध्यम से लक्ष्मी आबद्ध करना सम्भव नहीं है, यदि स्तुति के माध्यम से लक्ष्मी आबद्ध की जा सकती है, तो प्रत्येक गृहस्थ व्यक्ति के घर वह व्यक्ति, जो नित्य अपने व्यवसाय स्थल पर जाकर लक्ष्मी की स्तुति करता है, उनके घरों में अब तक तो धन का ढेर लग जाना चाहिए था।

... परन्तु ऐसा प्रायः सम्भव नहीं होता, कोई भी व्यक्ति, जो स्तुति करता है, उसके घर धन की वर्षा नहीं होती, उनके घरों में धन का ढेर नहीं लगता; वे अपने पुरे जीवन में लक्ष्मी की स्तुति तो करते है, फिर भी कर्जदार ही बने रहते है, धन का उन्हें कोई अजस्त्र स्रोत नहीं मिलता, अतः स्पष्टतः शंकराचार्य ने अवश्य ही कोई ऐसा प्रयोग संपन्न किया होगा, जिसके माध्यम से वे लक्ष्मी को आबद्ध कर सकने में समर्थ हुए।

'तंत्र' एकमात्र ऐसा माध्यम है, जिसमें अनेक विद्याएं, अनेक ऐसे प्रयोग हैं, जिनका ज्ञान यदि व्यक्ति प्राप्त कर लेता है तो उसके माध्यम से वह किसी भी देवी-देवता को आबद्ध करने में समर्थ हो सकता है।

शंकराचार्य तो तंत्र के उच्चकोटि के ज्ञाता थे, उन्होनें ही बौद्ध धर्म को सम्पूर्ण भारतवर्ष से विस्थापित कर पुनः हिंदुत्व की स्थापना कि। तंत्र ही वह सबल माध्यम था, जिसके द्वारा शंकराचार्य कम उम्र में ही अपने लक्ष्य की पूर्णता प्राप्त सके। वास्तव में देखा जाय, तो शंकराचार्य का जीवन अनेक रहस्यों से ओत-प्रोत है, जिसकी विवेचना करना, अनेक गोपनीय रहस्यों को उजागर करना ही होगा।

शंकराचार्य के जीवन का गोपनीय तत्थ्य ही है, कि संन्यासी होते हुए भी, संन्यास धर्म का पालन करते हुए भी किसी के समक्ष याचना नहीं की, वरन स्वयं तो समर्थ हुए ही, साथ ही सब कुछ प्रदान करने में सक्षम भी हुए।

जब शंकराचार्य ने देखा, कि समाज कि व्यवस्था में असंतुलन आ जाने के कारण उच्चकोटि की आध्यात्मिक विभूतियाँ भी भीक्षा मांग कर जीवन मांग कर जीवन यापन करने पर विश्वास करने लगी है एवं साधनों का महत्त्व न्यूनतर होता जा रहा है, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि कर्मक्षेत्र एवं साधनापक्ष को छोड़कर भिक्षावृत्ति में विश्वास करने लगे हैं, तब शंकराचार्य को इन सभी परिस्थितियों से बहुत ग्लानी हुई। वे चाहते, कि भारतवर्ष का कोई भी व्यक्ति भूखा, गरीब लाचार, बीमार तथा ज्ञान के अभाव में न जिये; जिये तो पौरूषता का जीवन जिये, श्रेष्ठता का जीवन जिये।

... और तब उन्होनें अथक परिश्रम एवं खोजबीन के पश्चात अत्यन्त दुर्लभ अवं गोपनीय प्रयोगों का अन्वेषण किया। इन प्रयोगों को स्वयं सिद्ध कर दिखा दिया, कि एक सन्यासी भी सभी दृष्टियों से पूर्णता युक्त जीवन जी सकता है, एक गरीब से गरीब व्यक्ति भी साधना के माध्यम से आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त कर सकता है ... और यह सिद्ध किया एक ब्राह्मणी के घर में इस प्रयोग के माध्यम से धन वर्षा करवा कर ... जिससे उस समय के लोग तो आचम्भित हुए बिना नहीं रह सके।

व्यक्ति के जीवन में इतनी आधिक विषमताएं उत्पन्न हो चुकी है, कि उसे समाज में प्रतिष्ठित व् सम्मानित होने कल लिए होने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है, बिना धन के तो वह समाज में अपनी प्रतिष्ठा व् सम्मान स्थापित कर ही नहीं सकता।

आज छोटी-छोटी वस्तु की भी यदि आवश्यकता होती है, तो बिना धन के हम उसे खरीद नहीं सकते, ललचायी नजरों से दूसरों की और ताकेंगे या किसी अन्य माध्यम से उसे प्राप्त करने का प्रयास करेंगे, क्योंकि वस्तु की आवश्यकता हमें यह सब करने पर मजबूर करेगी, परन्तु यह नैतिकता के और समाज के नियमों के विपरीत है।

ऐसी दशा में यह आवश्यक हो गया है, कि हम साधना के महत्त्व को समझें। हम सभी अपने जीवन में साधनाओं को स्थान दे और अपनी हर आवश्यकता की पूर्ति का हेतु साधनाओं को बनाएं।

शंकराचार्य कृत विविध प्रयोगों में एक प्रयोग 'लक्ष्योत्तमा प्रयोग' भी है, जो धन वर्षा कराने में सक्षम है। यह अपने आपमें अद्वितीय प्रयोग है। यह साधना अत्यन्त सरल, सटीक तथा शीघ्र प्रभाव देने वाली कही गई है। यदि यह प्रयोग पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा, विश्वास एवं पूर्ण प्रामाणिक सामग्री तथा विधि-विधान के साथ किया जाय, तो अवश्य ही सफलता प्राप्त होती है।

यह प्रयोग तब अब तक गोपनीय ही रहा है, किंतु पत्रिका के उद्देश्य को ध्यान में रखकर साधकों के समक्ष उच्चकोटि की इस साधना को पत्रिका के इन पन्नों पर जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं -

साधना विधान
  • इस साधना में आवश्यक है सामग्री है - 'लक्ष्म्योत्तमा यंत्र' तथा कमलगट्टे की माला ।
  • यह रात्रिकालीन साधना है और २१ दिनों तक नियमित रूप से की जाती है। साधना काल में एक समय सात्विक भोजन करें व् ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • इस साधना को आप पूर्णिमा से या किसी भी रविवार से प्रारम्भ कर सकते हें।
  • साधक सफेद रंग की धोती पहने तथा स्नान आदि कर रात्री के १० बजे के बाद साधना प्रारम्भ करें।
  • लकडी के बाजोट पर लाल रंग का वस्त्र बिछा लें उस पर एक ताम्र पात्र में केसर से 'श्री' बीज अंकित कर, उस पर यंत्र स्थापित कर यंत्र का पूजन करें।
  • बाजोट पर दाहिनी ओर चावलों की ढेरी बनाकर कमलगट्टे की माला को स्थापित कर पुष्प, कुंकुम तथा अक्षत से संक्षिप्त पूजन करें।
  • घी का दीपक तथा धुप लगाकर उनका अक्षत तथा कुंकुम से पूजन करें।
  • देवी का ध्यान करें -

अरुणकमलसंस्था तद्रजः पुंजवर्णा,
करकमल ध्रुतेष्टामितिमाम्बुजाता ।
मणिमुकुट विचित्रालंकृता कल्पजालै;
सकल भुवंमाता सततं श्रीः श्रीयै नमः ॥

  • कमलगट्टे की माला से नित्य २१ माला निम्न मंत्र का जप करें -

ॐ श्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै श्रीं श्रीं ॐ नमः

  • साधना समाप्त होने पर अगले दिन यंत्र माला को बाजोट पर बिछे लाल रंग के कपड़े में बांध कर नदी में प्रवाहित कर दें।

-मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान पत्रिका, सितम्बर 2009

गुरुवार, 11 सितंबर 2008

राज्यलक्ष्मी (महायोग लक्ष्मी) मांत्रोक्त साधना

यह साधना राज्य पक्ष को अपने अनुकूल करने की साधना है। राज्य का तात्पर्य व्यक्ति के जीवन में कर, मुकदमा इत्यादि से आने वाली बाधाओं से है। हर व्यक्ति का नित्य राज्य -पक्ष के पचास कार्यालयों में कार्य पड़ता है और यदि ये कार्य सरल रूप से हो जाए तो व्यक्ति अपने जीवन में शीघ्र उन्नति कर सकता है और इसका एक ही उपाय है, राज्य लक्ष्मी महायोग मांत्रोक्त साधना।

केवल व्यापारी ही नहीं, सामान्य वर्ग भी राज्यपक्ष से विवाद में फंसना नहीं चाहता क्योंकि सामान्य व्यक्ति के पास इतने साधन नहीं होते, जिससे वह पुरे राजतंत्र और उसकी जटिलताओं से बच कर निकल सके। ऐसे में क्या उपाय शेष रह जाता है? क्या व्यक्ति ऐसे ही विभिन्न कार्यालयों के चक्कर काटता रहे और अपने जीवन के सुख-चैन, शांति के क्षण दिन-दिन भर कोर्ट कचहरी के जटिल और उबाऊ कार्य पद्धति में खपा दे? क्या वह एक सामान्य से कार्य के लिए अधिकारियों के दरवाजे पर नाक घिसता रहे और अपने स्वाभिमान व आत्मसम्मान को गिरवी रख दे? निश्चित रूप से नहीं। ऐसी दशा में तो एक ही प्रयोग शेष रह जाता है, की वह अपने जीवन में पूर्णता से राज्यलक्ष्मी की साधना सम्पन्न करे। इस लेख में दिए गए अन्य प्रयोगों की भांति यह भी तांत्रोक्त प्रयोग है।

जीवन में व्याप्त ऐसी प्रत्येक कटु व अपमानजनक स्थितियों के निवारण की व्यावहारिक विधि है। निवारण का तात्पर्य यह नहीं होता हम किसी का विनाश कर देंगे, अपितु यह होता है कि दुर्भाग्यवश जो हमारे जीवन में प्रतिकूल स्थिति है वह समाप्त हो, तथा अनुकूलता प्रारम्भ हो। राज्यलक्ष्मी प्रयोग ऐसा ही प्रयोग है, राज्य पक्ष में मधुरता व सहजता की स्थिति निर्मित करने का प्रयोग है।

साधक के लिए आवश्यक है कि वे पूर्ण रूप से सिद्ध लक्ष्मी लघु शंख प्राप्त करें और उसे पूरी तरह से काजल में रंग दे तथा मूंगे की माला द्वारा निम्न मंत्र का पांच माला मंत्र जप करें।

यह प्रयोग मंगलवार के दिन ही किया जा सकता है। मंत्र जप की समाप्ति पर साधक मूंगे की माला को स्वयं धारण करें तथा शंख को काले कपड़े में लपेट कर जेब अथवा बैग में रखें जिस पर किसी कि नजर न पड़े।

मंत्र
॥ ॐ श्रीं श्रीं राज्यलक्ष्म्यै नमः ॥


जब भी आवश्यकता हो, तब उपरोक्त शंख को वार्तालाप करते समय अपने साथ ले जाएं और आप पाएंगे कि स्थितियां आपके अनुकूल हो रही हैं। अनावश्यक रूप से लगने वाली बाधाएं और अड़चनें समाप्त हो रही हैं तथा आपके प्रति सहयोग का वातावरण बनने लगा है। सामान्य साधक भी ऐसे शंख को अपने साथ रखकर जिस दिन मुकदमों में पेशी हो या कहीं अन्य कोई महत्वपूर्ण कार्य हो तो इसका प्रभाव प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं।

-मंत्र-तंत्र-यंत्र पत्रिका, फरवरी २००८

रविवार, 25 मई 2008

ऋण मोचन लक्ष्मी साधना

कर्ज का भार व्यक्ति के जीवन में अभिशाप की तरह होता है, जो व्यक्ति की हंसती हुई जिन्दगी में एक विष की भांति चुभ जाता है, जो निकाले नहीं निकलता और व्यक्ति को त्रस्त कर देता है। ऋण का ब्याज अदा करते-करते लम्बी अवधि हो जाती है, पर मूल राशी वैसी की वैसे बनी रहती है। नवरात्रि में ऋण मोचन लक्ष्मी की साधना करने से व्यक्ति कितना भी अधिक ऋणभार युक्त क्यों न हो, उसकी ऋण मुक्त होने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है।

नवरात्री में अथवा इस काल में संकल्प लेकर किसी भी सप्तमी से नवमी के बीच साधना कर सकता है। इस प्रयोग के लिए प्राणप्रतिष्ठायुक्त 'ऋण मुक्ति यंत्र' और 'ऋण मोचन लक्ष्मी तंत्र फल' की आवश्यकता होती है। साधना वाले दिन साधक प्रातः काल स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर, पूर्व दिशा की ओर मुख कर अपने पवित्र आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने एक बाजोट पर लाल रंग का कपडा बिछाकर उस पर किसी पात्र में यंत्र स्थापित कर दें, यंत्र के ऊपर कुंकुम से अपना नाम अंकित कर दें, उस पर तंत्र फल को रख दें। धुप-दीप से संक्षिप्त पूजन करें। वातावरण शुद्ध एवं पवित्र हो। फिर निम्न मंत्र का डेढ़ घंटे जप करें -

मंत्र
॥ ॐ नमो ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं क्लीं क्लीं श्रीं लक्ष्मी मम गृहे धनं देही चिन्तां दूरं करोति स्वाहा ॥


अगले दिन यंत्र को जल मे विसर्जीत कर दें तथा, ऋण मोचन फल को प्रयोगकर्ता स्वयं अपने हाथों से किसी गरीब या भिखारी को अतिरिक्त दान-दक्षिणा, फल-फूल आदि के साथ दें। कहा जाता है, की ऐसा करने से उस तंत्र फल के साथ ही व्यक्ति की ऋण बाधा तथा दरिद्रता भी दान में चली जाती है और उसके घर में भविष्य में फिर किसी प्रकार की दरिद्रता का वास नहीं रहता।

यदि दान लेने वाला नहीं मिले, तो प्रयोगकर्ता स्वयं किसी मन्दिर में जाकर दक्षिणा के साथ उस तंत्र फल को भेट चढ़ा दे। इस प्रयोग को संपन्न करने के बाद तथा तंत्र फल दान कर पुनः घर आने पर लक्ष्मी आरती अवश्य संपन्न करें। इस प्रकार प्रयोग पूर्ण हो जाता है।
मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान पत्रिका, फरवरी २००८

रविवार, 13 अप्रैल 2008

लक्ष्मी प्राप्ति के बीस सूत्र

सदगुरुदेव निखिलेश्वरानंन्द की वाणी से लक्ष्मी साधना के अद्वितीय

बीस सूत्र

प्रत्येक गृहस्थ इन सूत्रों-नियमों का पालन कर जीवन में लक्ष्मी को स्थायित्व प्रदान कर सकता है। आप भी अवश्य अपनाएं -

  1. जीवन में सफल रहना है या लक्ष्मी को स्थापित करना है तो प्रत्येक दशा में सर्वप्रथम दरिद्रता विनाशक प्रयोग करना ही होगा। यह सत्य है की लक्ष्मी धनदात्री हैं, वैभव प्रदायक हैं, लेकिन दरिद्रता जीवन की एक अलग स्थिति होती है और उस स्थिति का विनाश अलग ढंग से सर्वप्रथम करना आवश्यक होता है।

  2. लक्ष्मी का एक विशिष्ट स्वरूप है "बीज लक्ष्मी"। एक वृक्ष की ही भांति एक छोटे से बीज में सिमट जाता है - लक्ष्मी का विशाल स्वरूप। बीज लक्ष्मी साधना में भी उतर आया है भगवती महालक्ष्मी के पूर्ण स्वरूप के साथ-साथ जीवन में उन्नति का रहस्य।

  3. लक्ष्मी समुद्र तनया है, समुद्र से उत्पत्ति है उनकी, और समुद्र से प्राप्त विविध रत्न सहोदर हैं उनके, चाहे वह दक्षिणवर्ती शंख हो या मोती शंख, गोमती चक्र, स्वर्ण पात्र, कुबेर पात्र, लक्ष्मी प्रकाम्य क्षिरोदभव, वर-वरद, लक्ष्मी चैतन्य सभी उनके भ्रातृवत ही हैं और इनकी गृह में उपस्थिति आह्लादित करती है, लक्ष्मी को विवश कर देती है उन्हें गृह में स्थापित कर देने को।

  4. समुद्र मंथन में प्राप्त कर रत्न "लक्ष्मी" का वरण यदि किसी ने किया तो वे साक्षात भगवान् विष्णु। आपने पति की अनुपस्थिति में लक्ष्मी किसी गृह में झांकने तक की भी कल्पना नहीं कर करतीं और भगवान् विष्णु की उपस्थिति का प्रतीक है शालिग्राम, अनंत महायंत्र एवं शंख। शंख, शालिग्राम एवं तुलसी का वृक्ष - इनसे मिलकर बनता है पूर्ण रूप से भगवान् लक्ष्मी - नारायण की उपस्थिति का वातावरण।

  5. लक्ष्मी का नाम कमला है। कमलवत उनकी आंखे हैं अथवा उनका आसन कमल ही है और सर्वाधिक प्रिय है - लक्ष्मी को पदम। कमल - गट्टे की माला स्वयं धारण करना आधार और आसन देना है लक्ष्मी को आपने शरीर में लक्ष्मी को समाहित करने के लिए।

  6. लक्ष्मी की पूर्णता होती है विघ्न विनाशक श्री गणपति की उपस्तिथि से जो मंगल कर्ता है और प्रत्येक साधना में प्रथम पूज्य। भगवान् गणपति के किसी भी विग्रह की स्थापना किए बिना लक्ष्मी की साधना तो ऐसी है, ज्यों कोई अपना धन भण्डार भरकर उसे खुला छोड़ दे।

  7. लक्ष्मी का वास वही सम्भव है, जहां व्यक्ति सदैव सुरुचिपूर्ण वेशभूषा में रहे, स्वच्छ और पवित्र रहे तथा आन्तरिक रूप से निर्मल हो। गंदे, मैले, असभ्य और बक्वासी व्यक्तियों के जीवन में लक्ष्मी का वास संभव ही नहीं।

  8. लक्ष्मी का आगमन होता है, जहां पौरुष हो, जहां उद्यम हो, जहां गतिशीलता हो। उद्यमशील व्यक्तित्व ही प्रतिरूप होता है भगवान् श्री नारायण का, जो प्रत्येक क्षण गतिशील है, पालन में संलग्न है, ऐसे ही व्यक्तियों के जीवन में संलग्न है। ऐसे ही व्यक्तियों के जीवन में लक्ष्मी गृहलक्ष्मी बनकर, संतान लक्ष्मी बनकर आय, यश, श्री कई-कई रूपों मे प्रकट होती है।

  9. जो साधक गृहस्थ है, उन्हें अपने जीवन मे हवन को महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिए और प्रत्येक माह की शुक्ल पंचमी को श्री सूक्त के पदों से एक कमल गट्टे का बीज और शुद्ध घृत के द्वारा आहुति प्रदान करना फलदायक होता है।

  10. आपने दैनिक जीवन क्रम में नित्य महालक्ष्मी की किसी ऐसी साधना - विधि को सम्मिलित करना है, जो आपके अनुकूल हो, और यदि इस विषय में निर्णय - अनिर्णय की स्थिति हो तो नित्य प्रति, सूर्योदय काल में निम्न मन्त्र की एक माला का मंत्र जप तो कमल गट्टे की माला से अवश्य करना चाहिए।
    मंत्र: ॐ श्रीं श्रीं कमले कमलालाये प्रसीद प्रसीद मम गृहे आगच्छ आगच्छ महालक्ष्म्यै नमः

  11. किसी लक्ष्मी साधना को आपने जीवन में अपनायें और उसे किस मन्त्र से संपन्न करे उसका उचित ज्ञान तो केवल आपके गुरुदेव के पास ही है, और योग्य गुरुदेव अपने शिष्य की प्रार्थना पर उसे महालक्ष्मी दीक्षा से विभूषित कर वह गृह्य साधना पद्धति स्पष्ट करते है, जो सम्पूर्ण रूप से उसके संस्कारों के अनुकूल हो।

  12. अनुभव से यह ज्ञात होता है की बड़े-बड़े अनुष्ठान की अपेक्षा यदि छोटी साधानाए, मंत्र-जप और प्राण प्रतिष्ठायुक्त यंत्र स्थापित किए जाएं तो जीवन में अनुकूलता तीव्रता से आती है और इसमें हानि की भी कोई संभावना नहीं होती।

  13. जीवन में नित्य महालक्ष्मी के चिंतन, मनन और ध्यान के साथ-साथ यंत्रों का स्थापन भी, केवल महत्वपूर्ण ही नहीं, आवश्यक है। श्री यंत्र, कनक धारा यंत्र और कुबेर यंत्र इन तीनों के समन्वय से एक पूर्ण क्रम स्थापित होता है।

  14. जब कोई छोटे-छोटे प्रयोग और साधनाएं सफल न हो रही हों तब भी लक्ष्मी की साधना बार-बार अवश्य ही करनी चाहिए।

  15. पारद निर्मित प्रत्येक विग्रह आपने आप में सौभाग्यदायक होता है, चाहे वह पारद महालक्ष्मी हो या पारद शंख अथवा पारद श्रीयंत्र। पारद शिवलिंग और पारद गणपति भी आपने आप में लक्ष्मी तत्व समाहित किए होते हैं।

  16. जीवन में जब भी अवसर मिले, तब एक बार भगवती महालक्ष्मी के शक्तिमय स्वरूप, कमला महाविद्या की साधना अवश्य ही करनी चाहिए, जिससे जीवन में धन के साथ-साथ पूर्ण मानसिक शांति और श्री का आगमन हो सके।

  17. धन का अभाव चिंता जनक स्थिति में पहुंच जाय और लेनदारों के तानों और उलाहनों से जीना मुश्किल हो जाता है, तब श्री महाविद्या साधना साधना करना ही एक मात्र उपाय शेष रह जाता है।

  18. जब सभी प्रयोग असफल हो जाएं, तब अघोर विधि से लक्ष्मी प्राप्ति का उपाय ही अंतिम मार्ग शेष रह जाता है, लेकिन इस विषय में एक निश्चित क्रम अपनाना पड़ता है।

  19. कई बार ऐसा होता है की घर पर व्याप्त किसी तांत्रिक प्रयोग अथवा गृह दोष या अतृप्त आत्माओं की उपस्थिति के कारण भी वह सम्पन्नता नहीं आ पाती, जो की अन्यथा संभव होती है। ऐसी स्थिति को समझ कर "प्रेतात्मा शांति" पितृ दोष शान्ति करना ही बुद्धिमत्ता है।

  20. उपरोक्त सभी उपायों के साथ-साथ सीधा सरल और सात्विक जीवन, दान की भावना, पुण्य कार्य करने में उत्साह, घर की स्त्री का सम्मान और प्रत्येक प्रकार से घर में मंगलमय वातावरण बनाए रखना ही सभी उपायों का पूरक है क्योंकि इसके अभाव में यदि लक्ष्मी का आगमन हो भी जाता है तो स्थायित्व संदिग्ध रह जाता है।

- मंत्र-तंत्र-यंत्र पत्रिका, फरवरी २००८