रविवार, 27 जून 2010

युग परिवर्तन

संसार निरन्तर परिवर्तनशील है और समय के साथ-साथ व्यक्ति की मान्यताएं, भावनाएं और इच्छाएं बदलती रही हैं; कुछ समय पूर्व सामाजिक व्यवस्था ऐसी थी, जब व्यक्ति की आवश्यकताएं न्यून थीं और वे परस्पर मिल कर अपनी आवश्यकाओं की पूर्ति कर लेते थे, किसान अपना अनाज मोची को देता था और बदले में जूते बनवा लेता था, मोची चमड़े का काम करके दर्जी को देता था, और बदले में अपने कपडे सिलवा लेता था, इस प्रकार वे परस्पर एक-दुसरे के सहयोग से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेते थे|

परन्तु धीरे-धीरे युग में परिवर्तन आया और व्यक्ति के मन में एक-दुसरे के प्रति सन्देह का भाव बढ़ा; उसने सोचा, कि मैं अनाज दे रहा हूं, वह ज्यादा कीमती है, इसकी अपेक्षा यह जो मोची मुझे काम करके देता है, उसका मूल्य कम है, ऐसी स्थिति आने पर मुद्रा का विनिमय प्रारम्भ हुआ, तब जीवन में एक-दुसरे के कार्य की पूर्ति में मुद्रा मुख्य आधार बन गया|

लेकिन समय परिवर्तन के साथ ही साथ सामाजिक जीवन ज्यादा से ज्यादा जटिल होता गया, एक-दुसरे से आगे बढ़ने की होड़ लग गई और जल्दी से जल्दी अपने लक्ष्य तक पहुंचने की भावना तीव्र हो गई, प्रत्येक व्यक्ति इस प्रयत्न में लग गया, कि जल्दी से जल्दी  उस गंतव्य स्थल पर पहुंच जाय, जो कि उसका लक्ष्य है; फलस्वरूप उसमें प्रतिस्पर्धा, द्वेष और एक-दुसरे को पछाड़ने की प्रवृत्ति बढ़ गई, व्यापारी जल्दी से जल्दी लखपति बनने की फिराक में मशगूल हो गए, अधिकारियों ने अपने विभाग में सबसे ऊँचे पद पर पहुंचने के लिए जी-तोड़ प्रयास करना प्रारम्भ कर दिया और इस प्रकार एक ऐसी होड़ लग गई, जिसके रहते किसी प्रकार की शान्ति नहीं, प्रत्येक व्यक्ति के मन में एक छटपटाहट, एक बेचैनी, एक असंतोष की भावना बढ़ने लगी .. परन्तु इससे एक लाभ यह भी हुआ, कि व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा सक्रीय हो गया और इस प्रकार इस प्रतिस्पर्धा के फलस्वरूप उन्नति के द्वार सभी के लिए सामान रूप से खुल गए|

परन्तु जब एक लक्ष्य हो और प्रतिस्पर्धी ज्यादा हों, तो एक विशेष प्रकार की होड़ व्यक्ति के मन में जम जाती है, वह अपने भौतिक प्रयत्नों के साथ-साथ भारत की प्राचीन विद्याओं की तरफ भी उन्मुख होने लगा और उनके माध्यम से अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी प्रयत्नशील बना, उसने इस सम्बन्ध में प्रयत्न भी किये और जब उसने अनुभव किया, कि अन्य भौतिक प्रयत्नों की अपेक्षा इनसे जल्दी और निश्चित सफलता मिलती है, तब वह इसकी खोज में ज्यादा प्रयत्नशील बना, वह ऐसे मन्त्रों व् साधना विधियों की खोज में बढ़ा, जिससे उसकी इच्छा पूर्ति सहजता से और शीघ्र हो सके|

मंत्र-तंत्र, साधना-उपासना, पूजा-पाठ आदि हमारी प्राचीन संस्कृति का मजबूत आधार है| एक ऐसा समय भी था, जब हम इनकी बदौलत संसार में अग्रगण्य थे और हमने समस्त भौतिक सुविधाओं को सुलभ कर लिया था, जिस समय पूरा संसार अज्ञान और अशिक्षा के अन्धकार में डूबा था, उस समय भी हमने प्रकृति को अपने नियंत्रण में सफलतापूर्वक ले लिया था, लंकाधिपति रावण ने पवन, अग्नि और अन्य प्राकृतिक तत्वों को मन्त्रों की सहायाता से इतना आधिक नियंत्रण में कर लिया था, कि वे उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करते थे, हमारे पूर्वज त्रिकालदर्शी थे और अपने स्थान पर बैठे-बैठे हजारों-लाखों मील दूर घटित घटनाओं को अपनी आँखों से देखने में समर्थ थे - ये सारे तथ्य इस बात को स्पष्ट करते हैं, कि हमारी परम्परा अत्यंत समृद्ध रही है और हमने इन मंत्र, तंत्र, यंत्रों के माध्यम से अदभुत सफलताएं प्राप्त की हैं|

कालांतर में हम पर विदेशी आक्रमण होते गए और उन लोगों ने हमारे उच्चकोटि के ग्रन्थ जला कर राख कर दिए, इस प्रकार से हम एक समृद्ध परम्परा से वंचित हो गए, हममे वह क्षमता नहीं रही, जो कि हमारे पूर्वजों में थी|

फिर समय बदला और लोगों ने यह महसूस किया, कि बिना इन मंत्र-तंत्रों की सहायता से हम अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकते; इस संघर्ष में यदि हमें टिके रहना है, तो यह जरूरी है, कि इस उच्चकोटि की विद्या को पुनः प्राप्त कर योग्य गुरु से भली प्रकार समझा जाय, उन सारे नियमों-उपनियमों का पालन कर इन साधनाओं में सफलता प्राप्त की जाय, जिससे कि हमारा जीवन सुखमय, उन्नतिदायक और परिपूर्ण हो|

परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है, ऐसी स्थिति में श्रेष्ठ मंत्र मर्मज्ञ प्रकाश में नहीं आये; जिनको ज्ञान है, वे स्वान्तः सुखाय पद्धति में विश्वास करते हैं और हिमालय के उन स्थानों पर तपस्यारत हैं, जहां आम आदमी का जाना संभव नहीं है| जो गृहस्थ जीवन में उच्चकोटि के अध्येता हैं, वे अपनी ही साधना में लीन हैं, उन्हें स्वार्थ का, छल-कपट का ज्ञान नहीं है, इसकी अपेक्षा नकली चमक-दमक वाले साधू-सन्तों और संन्यासियों की भीड़ एकत्र हो गई, जो आडम्बर से तो परिपूर्ण थे, लेकिन उनमे ठोस ज्ञान का सर्वथा अभाव था| सामान्य जन श्रेष्ठ और नकली साधू-सन्तों में भेद या अन्तर नहीं कर पाता, फ़लस्वरूप वे कई स्थानों पर धोके के शिकार हुए और इस प्रकार धीरे-धीरे जब उनका कार्य नहीं हुआ तो उनका विश्वास डगमगाने लगा, उन्हें आशंका होने लगी - ये मंत्र-तंत्र वास्तविक है भी या नहीं?

और इस प्रकार के विचारों ने उनकी आस्था की नींव हिला दी| परन्तु नकली चमक-दमक के बीच में ऐसे भी साधू, योगी या  गृहस्थ गुरु विद्यमान रहे, जो निःस्वार्थ भाव से अपने रास्ते पर निरन्तर गतिशील बने रहे, चमक-दमक को देखने के बाद वे उस  नकली जमात में नहीं मिले, जो स्वार्थ पर आधारित थी, क्योंकि उनके पास ठोस ज्ञान था, एक समृद्ध परम्परा थी, जिससे माध्यम से असंभव कार्य को भी संभव किया जा सकता था|

जब सामान्य जनता उन नकली लोगों से उब गई, तो उन्हें अपनी गलती महसूस और वे इस खोज में लगे, कि हमारे पूर्वजों की यह समृद्ध परम्परा गलत नहीं हो सकती, अवश्य ही इन नकली लोगों में ही त्रुटी है या इन्हें इस सम्बन्ध में पूरा ज्ञान नहीं है, जिससे कि मनोकामना सिद्धि हो सके|

आज का मानव-समाज इतना अधिक जटिल हो गया है, कि मानव की समस्याओं का कोई अंत नहीं है, आगे बढ़ने में पग-पग पर कठिनाइयां और समस्याओं का सामना करना ही पड़ता है, जिससे उसकी प्रगति अवरुद्ध हो जाती है|

आर्थिक समस्या, पुत्र न होने की समस्या, पुत्र प्राप्त होने पर भी कुपुत्र होने की समस्या, दुराचारी पत्नी की समस्या, पति-पत्नी में अनबन की समस्या, व्यर्थ में मुकदमे और बाधाओं की समस्या, रोजी की समस्या, व्यापार प्रारंभ न होने की समस्या, व्यापार वृद्धि की समस्या, विभिन्न रोगों से ग्रसित होने की समस्या, मानसिक चिंता दूर न होने की समस्या, पुत्री के लिये उपयुक्त वर न मिलने की समस्या, पुत्री का विवाह होने के बाद उसका वैवाहिक जीवन सुखी न होने की समस्या, नौकरी की समस्या, प्रमोशन की समस्या, घर में सुख शान्ति की समस्या, अधिकारीयों से मतभेद होने की समस्या, आकस्मिक मृत्यु की समस्या, भाग्योदय न होने की समस्या, जरूरत से ज्यादा कर्जा बढ़ जाने की समस्या, समय पर उच्च सम्मान प्राप्त न होने की समस्या, भूत-प्रेत-पिशाच बाधा, घर में सुख-शान्ति न रहने की समस्या|

-- और इस प्रकार की सैंकड़ों-हजारों समस्याएं हैं, जिनसे पग-पग पर व्यक्ति को जूझना पड़ता है, जिससे उनका अत्यधिक श्रम और शक्ति इन्हीं समस्याओं को हल करने में लग जाती हैं|

इन समस्याओं का समाधान सामाजिक कार्यों के माध्यम से संभव नहीं है और ना ही विज्ञान के पास इसका कोई हल है, इनके लिये कुछ आधार या कुछ ऐसी विद्याओं की जरूरत है, जो गूढ़ विद्याएं कही जाती हैं, इन विद्याओं के अन्तर्गत यंत्र-तंत्र, साधना-उपासना, पूजा-पाठ मंत्र जप आदि जरूरी है|

अभी तक ये कार्य विशेष पंडित वर्ग ही संपन्न करता रहा, परन्तु धीरे-धीरे इन पंडितों के स्तर में भी न्यूनता आ गई, उनकी आगे की पीढ़ी इतनी योग्य न हो  सकी, जो दुसरे लोगों की समस्याओं को इन विद्याओं के माध्यम से दूर कर सकें; तब वे व्यक्ति अपने गुरु के समीप बैठ कर उन उपायों की खोज करने लगे, जिसके माध्यम से वे स्वयं इस प्रकार की साधनाएं संपन्न कर समस्याओं से मुक्ति पा  सके| आपके भी जीवन में ऐसे गुरु का आगमन हो यही आपको आशीर्वाद|

- श्री नारायण दत्त श्रीमाली

शनिवार, 8 मई 2010

तिमिर

सूर्य की रश्मियों से ही चन्द्रमा में प्रकाश है और वह प्रकाशवान दिखाई देता है| जबकि यह दृश्य प्रत्यक्षतः स्पष्ट दिखाई नहीं देता है, कि सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर है और अन्य तारा मंडल पर पड़ रहा है और वे उसी से जगमगा रहे हैं| यह सब अदृश्य रूप से होता है और यह बात ध्रुव सत्य है| ठीक ऐसा ही शिष्य का जीवन होता है, उसके स्व के अन्दर कोई विशेषता नहीं होती, पर वह धीरे-धीरे  प्रसिद्धि के शिखर की ओर उन्मुख होता ही जाता है, ज्यों-ज्यों उसके अन्दर गुरु के प्रति समर्पण, सेवा और भक्ति का चन्द्रमा जगमगता है ... उसका नाम, यश, समाज में चन्द्रमा की किरणों की भांति बिखरता ही जता है और शिष्य को यह भान भी नहीं होता कि यह सब कैसे हो रहा है| वह तो सोचता है, कि यह प्रतिभा उसकी स्वयं की है और एक क्षण ऐसा आता है, कि वह प्रसिद्धि के मद में आकर गुरु के सान्निध्य को त्याग देता है, अपने निज स्वार्थ की पूर्ती के लिये| और गुरु से अलग होते ही उसे वस्तु-स्थिति का भान हो जाता है, कि क्या सही है? समाज कि विषमताओं के बीच जाकर धीरे-धीरे वह अधोगामी होता जाता है| इस सम्बन्ध में मुझे एक कथा स्मरण आ राहे है -

पौष की कडकडाती  ठंड में ऋषि गर्ग विचार मग्न बैठे हुए थे .. सांझ की बेला थी| ठंड कम करने के लिये कोयलों से भरा अलाव धधक रहा था| गर्ग का प्रिय शिष्य 'विश्रवानंद', जिसके ज्ञान की गरिमा कि चर्चा जनमानस में फैलती जा रही थी, इस बात से उसे धीरे-धीरे अभिमान हो गया और गुरु आश्रम त्यागने का निश्चय कर वह गुरु के पास गया ... ऋषि गर्ग उसकी मनोस्थिति को पढ़ रहे थे| पर फिर भी मौन थे, उन्हें अपने पर पूरा विश्वास था, कि मेरे द्वारा लगाया हुआ पौधा मुरझा नहीं सकता| विश्रवानंद ने गुरु से  आज्ञा मांगी| ऋषि गर्ग मौन बैठे रहे, थोड़ी देर बाद उन्होनें धदकते अलाव से एक कोयले के तुकडे को, जो काफी तेजी से दहक रहा था ... बाहर निकाला ..कोयले का टुकड़ा कुछ देर तो जलता रहा ... पर धीरे-धीरे उसकी दहकता शांत हो गयी, उस पर राख की परत चढ़ती गयी, देखते-देखते उसकी आभा धूमिल हो गयी| विश्रवानंद खड़े-खड़े यह क्रिया देख रहे थे .. समझ लिया गुरु के मौन संकेत को ... और चुपचाप आश्रम के अन्दर जा कर साधनारत हो गए|

-मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान, अप्रैल २०१० 

रविवार, 18 अप्रैल 2010

कुल देवता - कुल देवी साधना

जिनकी कृपा से कु;परिवार में शान्ति एवं सम्पन्नता आती है| कुल देवी-कुल देवता पुरे परिवार की रक्षा करते हैं, आने वाले संकटों को हटा देते हैं| इसीलिए सारी पूजाओं में यज्ञ में कुल देवता-देवी पूजा का विधान है, कुल देवी-कुल देवता साधना करने से परिवार में पितृ दोष भी दूर हो जाता है|

जिस परकार मां-बाप स्वतः ही अपने पुत्र-पुत्रियों के कल्याण के प्रति चिंतित रहते हैं, ठीक उसी प्रकार कुलदेवता या कुलदेवी अपने कुल के सभी मनुष्यों पर कृपा करने को तत्पर रहते हैं, ठीक माता-पिता और एक कुशल अभिभावक की तरह जब अपने कुल के मनुष्यों को उन्नति करते, समृद्धि और साधन से युक्त होते हुए उस कुल के देवता देखते हैं, तो उन्हें अपूर्व आनन्द होता है|

मूल रूप से कुलदेवता अपनी कृपा कुल पर बरसाने को तैयार रहते हैं, परन्तु देवयोनि में होने के कारण बिना मांगे स्वतः देना उनके लिये उचित नहीं होता हैं| परन्तु यह देने की क्रिया तभी होती है, जब साधक मांग करता है| इसीलिए प्रार्थना, आरती पूजा का विधान होता है|

इस साधना द्वारा निश्चय ही कुलदेव की कृपा से जीवन संवर जाता है, और भौतिक सफलता के लिये तो यह शीघ्र प्रभावी साधना है|

व्यक्ति की पहचान सर्वप्रथम उसके कुल से होती है| प्रत्येक व्यक्ति का जिस प्रकार नाम होता है, गोत्र होता है, उसी प्रकार कुल भी होता है| 'कुल' अर्थात खानदान या उसकी वंश परम्परा| जिस वंश वह सम्बंधित होता है, वह वंश तो हजारो-लाखों वर्षों से चला आ रहा है, लेकिन आज सामान्य व्यक्ति अपने कुल की तीन-चार पीढ़ियों से अधिक नाम नहीं जनता| यह कैसी विडम्बना है? यदि किसी व्यक्ति से उसके परदादा के भाइयों के नाम पूछे जाएं, तो वह बता नहीं पाता है| यह न भी याद रहे तो भी अपने कुल और गोत्र सदैव ध्यान रखना तो आवश्यक ही है क्योंकि प्रत्येक कुल परम्परा में उस कुल के पूजित देवी-देवता अवश्य होते हैं, इसलिए वार, त्यौहार, पर्व आदि पर स्वर्गीय दादा, परदादा दे साठ ही कुल देवता अथवा कुलदेवी को भोग अर्पण अवश्य ही किया जाता है|

कुल देवता का तात्पर्य है - जिस देवता की कृपा से कुल में अभिवृद्धि हुई है, परिवार को सड़ाव एक अबे छात्र प्राप्त होता रहा है| आज की तीव्र जीवन शैली में हम अपनी मूल संस्कृति से उतना अधिक सम्पर्कित नहीं रह सके हैं, परन्तु यदि कुल की परम्पराओं और कुल के अस्तित्व को देखना हो, तो आज भी भारत के कुछ प्रमुख नगरों को छोड़कर शेष सभी स्थानों में ख़ास कर ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर भारतीय देव संस्कृति आज भी कई रूपों में जीवित है| कुल के देवताओं का अलग से मन्दिर होता है, उनकी पूजा होती है, और मात्र इसी के कई प्राकृतिक आपदाओं और बीमारियाँ में उनकी रक्षा होती है|

वाल्मीकि रामायण में देखने को मिलता है कि विश्वामित्र के आश्रम में विद्या अर्जित कर पुनः लौटने पर भगवान् राम ने अपने कुल के सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए साधना की थी| राजमहल के अन्दर ही एक मन्दिर में सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था, जिसके कारण वे आने वाले समय में युगपुरुष सिद्ध हो सके|

यदि ध्यान दिया जाए, तो विशेष साधनाओं के पूर्व जिस प्रकार गणपति पूजन, गुरु पूजन, भैरव स्मरण आदि रूप से आवश्यक रूप से संपन्न किया जाता है, उसी प्रकार संक्षिप्त रूप में 'कुलदेवताभ्यो नमः' प्रभूत शब्दों को भी उच्चारण किया जाता है| यह कुलदेवता के प्रति अभिवादन है जिससे उनका आशीर्वाद प्राप्त हो पूर्व साधना में सफलता प्राप्त हो सके| वस्तुतः कुल देवता ही साधक को समस्त प्रकार के वैभव, उन्नति, शक्ति, प्रतिष्ठा, सुख, शान्ति प्रदान करने में सक्षम होते हैं, यदि उन्हें साधना द्वारा प्रसन्न कर लिया जाए तो|

यह दो सप्ताह की साधना है जो, किसी भी अमावास्या से प्रारम्भ की जा सकती है| अर्थात यदि साधना सोमवार को प्रारंभ की जाए, तो पंद्रह दिन बाद सोमवार को ही उस साधना का समापन किया जाना चाहिए| इस साधना हेतु 'कुलदेवता यंत्र', कुलदेवी भैषज एवं प्रत्यक्ष सिद्धि माला की आवश्यकता होती है| इस साधना में कुल मिलाकर २१ माला प्रतिदिन मंत्र जप करना पड़ता है| यह विशेष कुलदेवी-कुलदेवता मंत्र है, जो कि आपको पत्रिका में मिलेगा|

-मंत्र-तंत्र-यंत्र पत्रिका जनवरी २००७