शनिवार, 8 मई 2010

तिमिर

सूर्य की रश्मियों से ही चन्द्रमा में प्रकाश है और वह प्रकाशवान दिखाई देता है| जबकि यह दृश्य प्रत्यक्षतः स्पष्ट दिखाई नहीं देता है, कि सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर है और अन्य तारा मंडल पर पड़ रहा है और वे उसी से जगमगा रहे हैं| यह सब अदृश्य रूप से होता है और यह बात ध्रुव सत्य है| ठीक ऐसा ही शिष्य का जीवन होता है, उसके स्व के अन्दर कोई विशेषता नहीं होती, पर वह धीरे-धीरे  प्रसिद्धि के शिखर की ओर उन्मुख होता ही जाता है, ज्यों-ज्यों उसके अन्दर गुरु के प्रति समर्पण, सेवा और भक्ति का चन्द्रमा जगमगता है ... उसका नाम, यश, समाज में चन्द्रमा की किरणों की भांति बिखरता ही जता है और शिष्य को यह भान भी नहीं होता कि यह सब कैसे हो रहा है| वह तो सोचता है, कि यह प्रतिभा उसकी स्वयं की है और एक क्षण ऐसा आता है, कि वह प्रसिद्धि के मद में आकर गुरु के सान्निध्य को त्याग देता है, अपने निज स्वार्थ की पूर्ती के लिये| और गुरु से अलग होते ही उसे वस्तु-स्थिति का भान हो जाता है, कि क्या सही है? समाज कि विषमताओं के बीच जाकर धीरे-धीरे वह अधोगामी होता जाता है| इस सम्बन्ध में मुझे एक कथा स्मरण आ राहे है -

पौष की कडकडाती  ठंड में ऋषि गर्ग विचार मग्न बैठे हुए थे .. सांझ की बेला थी| ठंड कम करने के लिये कोयलों से भरा अलाव धधक रहा था| गर्ग का प्रिय शिष्य 'विश्रवानंद', जिसके ज्ञान की गरिमा कि चर्चा जनमानस में फैलती जा रही थी, इस बात से उसे धीरे-धीरे अभिमान हो गया और गुरु आश्रम त्यागने का निश्चय कर वह गुरु के पास गया ... ऋषि गर्ग उसकी मनोस्थिति को पढ़ रहे थे| पर फिर भी मौन थे, उन्हें अपने पर पूरा विश्वास था, कि मेरे द्वारा लगाया हुआ पौधा मुरझा नहीं सकता| विश्रवानंद ने गुरु से  आज्ञा मांगी| ऋषि गर्ग मौन बैठे रहे, थोड़ी देर बाद उन्होनें धदकते अलाव से एक कोयले के तुकडे को, जो काफी तेजी से दहक रहा था ... बाहर निकाला ..कोयले का टुकड़ा कुछ देर तो जलता रहा ... पर धीरे-धीरे उसकी दहकता शांत हो गयी, उस पर राख की परत चढ़ती गयी, देखते-देखते उसकी आभा धूमिल हो गयी| विश्रवानंद खड़े-खड़े यह क्रिया देख रहे थे .. समझ लिया गुरु के मौन संकेत को ... और चुपचाप आश्रम के अन्दर जा कर साधनारत हो गए|

-मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान, अप्रैल २०१० 

रविवार, 18 अप्रैल 2010

कुल देवता - कुल देवी साधना

जिनकी कृपा से कु;परिवार में शान्ति एवं सम्पन्नता आती है| कुल देवी-कुल देवता पुरे परिवार की रक्षा करते हैं, आने वाले संकटों को हटा देते हैं| इसीलिए सारी पूजाओं में यज्ञ में कुल देवता-देवी पूजा का विधान है, कुल देवी-कुल देवता साधना करने से परिवार में पितृ दोष भी दूर हो जाता है|

जिस परकार मां-बाप स्वतः ही अपने पुत्र-पुत्रियों के कल्याण के प्रति चिंतित रहते हैं, ठीक उसी प्रकार कुलदेवता या कुलदेवी अपने कुल के सभी मनुष्यों पर कृपा करने को तत्पर रहते हैं, ठीक माता-पिता और एक कुशल अभिभावक की तरह जब अपने कुल के मनुष्यों को उन्नति करते, समृद्धि और साधन से युक्त होते हुए उस कुल के देवता देखते हैं, तो उन्हें अपूर्व आनन्द होता है|

मूल रूप से कुलदेवता अपनी कृपा कुल पर बरसाने को तैयार रहते हैं, परन्तु देवयोनि में होने के कारण बिना मांगे स्वतः देना उनके लिये उचित नहीं होता हैं| परन्तु यह देने की क्रिया तभी होती है, जब साधक मांग करता है| इसीलिए प्रार्थना, आरती पूजा का विधान होता है|

इस साधना द्वारा निश्चय ही कुलदेव की कृपा से जीवन संवर जाता है, और भौतिक सफलता के लिये तो यह शीघ्र प्रभावी साधना है|

व्यक्ति की पहचान सर्वप्रथम उसके कुल से होती है| प्रत्येक व्यक्ति का जिस प्रकार नाम होता है, गोत्र होता है, उसी प्रकार कुल भी होता है| 'कुल' अर्थात खानदान या उसकी वंश परम्परा| जिस वंश वह सम्बंधित होता है, वह वंश तो हजारो-लाखों वर्षों से चला आ रहा है, लेकिन आज सामान्य व्यक्ति अपने कुल की तीन-चार पीढ़ियों से अधिक नाम नहीं जनता| यह कैसी विडम्बना है? यदि किसी व्यक्ति से उसके परदादा के भाइयों के नाम पूछे जाएं, तो वह बता नहीं पाता है| यह न भी याद रहे तो भी अपने कुल और गोत्र सदैव ध्यान रखना तो आवश्यक ही है क्योंकि प्रत्येक कुल परम्परा में उस कुल के पूजित देवी-देवता अवश्य होते हैं, इसलिए वार, त्यौहार, पर्व आदि पर स्वर्गीय दादा, परदादा दे साठ ही कुल देवता अथवा कुलदेवी को भोग अर्पण अवश्य ही किया जाता है|

कुल देवता का तात्पर्य है - जिस देवता की कृपा से कुल में अभिवृद्धि हुई है, परिवार को सड़ाव एक अबे छात्र प्राप्त होता रहा है| आज की तीव्र जीवन शैली में हम अपनी मूल संस्कृति से उतना अधिक सम्पर्कित नहीं रह सके हैं, परन्तु यदि कुल की परम्पराओं और कुल के अस्तित्व को देखना हो, तो आज भी भारत के कुछ प्रमुख नगरों को छोड़कर शेष सभी स्थानों में ख़ास कर ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर भारतीय देव संस्कृति आज भी कई रूपों में जीवित है| कुल के देवताओं का अलग से मन्दिर होता है, उनकी पूजा होती है, और मात्र इसी के कई प्राकृतिक आपदाओं और बीमारियाँ में उनकी रक्षा होती है|

वाल्मीकि रामायण में देखने को मिलता है कि विश्वामित्र के आश्रम में विद्या अर्जित कर पुनः लौटने पर भगवान् राम ने अपने कुल के सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए साधना की थी| राजमहल के अन्दर ही एक मन्दिर में सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था, जिसके कारण वे आने वाले समय में युगपुरुष सिद्ध हो सके|

यदि ध्यान दिया जाए, तो विशेष साधनाओं के पूर्व जिस प्रकार गणपति पूजन, गुरु पूजन, भैरव स्मरण आदि रूप से आवश्यक रूप से संपन्न किया जाता है, उसी प्रकार संक्षिप्त रूप में 'कुलदेवताभ्यो नमः' प्रभूत शब्दों को भी उच्चारण किया जाता है| यह कुलदेवता के प्रति अभिवादन है जिससे उनका आशीर्वाद प्राप्त हो पूर्व साधना में सफलता प्राप्त हो सके| वस्तुतः कुल देवता ही साधक को समस्त प्रकार के वैभव, उन्नति, शक्ति, प्रतिष्ठा, सुख, शान्ति प्रदान करने में सक्षम होते हैं, यदि उन्हें साधना द्वारा प्रसन्न कर लिया जाए तो|

यह दो सप्ताह की साधना है जो, किसी भी अमावास्या से प्रारम्भ की जा सकती है| अर्थात यदि साधना सोमवार को प्रारंभ की जाए, तो पंद्रह दिन बाद सोमवार को ही उस साधना का समापन किया जाना चाहिए| इस साधना हेतु 'कुलदेवता यंत्र', कुलदेवी भैषज एवं प्रत्यक्ष सिद्धि माला की आवश्यकता होती है| इस साधना में कुल मिलाकर २१ माला प्रतिदिन मंत्र जप करना पड़ता है| यह विशेष कुलदेवी-कुलदेवता मंत्र है, जो कि आपको पत्रिका में मिलेगा|

-मंत्र-तंत्र-यंत्र पत्रिका जनवरी २००७ 

रविवार, 28 मार्च 2010

गुरु कृपा से कुल देवी की कृपा

 गुरु आये और मैं जान भी नहीं पाया 
लेकिन
गुरुदेव तो कृपालु है,
इस जन्म के क्या पूर्व जन्म के शिष्यों का ध्या रखते है 
जब मैंने कुल देवी की कृपा प्राप्त की

यद्यपि मैं संन्यासी तो नहीं रहा हूं, पर अपनी आदतों और स्वाभाविक प्रवृत्तियों को देखकर मैं अपने आप को किसी संन्यासी से कम भी नहीं समझता था| अकेले ही जंगलों में भटकना, और जड़ी-बूटियों की खोज करना यह मेरा बचपन से शौक था| यद्यपि आज मैं एक नागरिक जीवन व्यतीत कर रहा हूं, परन्तु आज भी मुझे बचपन के वे दिन याद आ जाते हैं, जब मैं गाँव में अपने पिता  के साथ रहता था| वे गाँव के एक प्रसिद्द वैद्य थे| आज मुझे आयुर्वेद का जो अच्छा ज्ञान है, वह सब उनके साथ रहने से ही हुआ है|

उन दिनों मेरी आयु लगबघ १८ वर्ष की रही होगी| मैं गाँव के समीपवर्ती जंगलों में अमलतास, गिलोय, अपामार्ग, श्वेतार्क, सर्पगंधा, कठ्चंपा आदि औषधियों की तलाश में गया था| प्रकृति के मध्य जब मैं होता हूं तो प्रायः उसमें खो जाता हूं, और उस दिन मैं अपनी मस्ती में जंगल से सुदूर भीतर आ पहुंचा था, जिस स्थान पर शायद ही कोई आया हो| इस का एहेसास मुझे तब हुआ, जब आसमान से हल्की-हल्की फुहारें शरीर पर पड़ने लगी| बरसात का मौसम चल रहा था, औषधियों को ढूँढना तो दूर मैं उमड़ते मेघों को ही देखता रहा, बारिश मूसलाधार हो रही थी, मैं बारिश के रुकने तक पीपल के एक पेड़ के नीचे खडा रहा, परन्तु बारिश रुकने का नाम तक न ले रही थी| थोड़ी देर में अन्धेरा गहराने लगा और दिशा भ्रम के कारण मैं घर का मार्ग भूल चुका था| अब मैं सूर्योदय तक वहीँ रुकने को विवश था|

रात्रि के गहन अंधकार में दूर-दूर तक किसी प्रकार की कोई सहायता मिलने का आसार नहीं था| वृक्ष के नीचे खड़े होकर मैं स्वयं को वर्षा से बचाने की चेष्ठा तो कर रहा था, परन्तु फिर भी पानी और ठण्ड से मुझे कंपकंपी सी लग रही थी| कुछ देर में मुझे ऐसा लगा कि दूर कहीं घण्टी बजने की आवाज आ रही हैं, ऐसा लग रहा था कि पास ही कोई मंदिर है, और कोई उसमें आरती या पूजा कर रहा है| मुझे लगा कि यदि मंदिर होगा तो रात्रि में वहां आश्रय मिल सकता है, फिर सुबह घर वापिस निकल चलूँगा| उसी आवाज की दिशा में अँधेरे में आगे कुछ दूर चलने पर गोल चबूतरे पर बना छोटा सा मंदिर दिखाई दिया| मन्दिर के भीतर चिराग का प्रकाश बाहर तक आ रहा था| देखने से लग रहा था, कि मन्दिर पुराणी ईटों से बना हुआ है और उसकी हालत देखकर ऐसा लगता था, जैसे यहां कोई आता नहीं हो| परन्तु अन्दर दीपक होने और घण्टी की आवाज सुनाई देने से इतना तो कहा जा सकता था कि कोई न कोई अवश्य ही वहां का रख रखाव करता है| आस-पास घूमकर भी देखा, परन्तु कोई नजर न आया, तो मैंने मन्दिर में प्रवेश किया| मन्दिर क्या था, चार दीवारों और एक छत से मिलकर बना एक कक्ष मात्र था, जिसमें पूर्व दिशा की ओर एक देवी की मूर्ती स्थापित थी| मूर्ती पुरानी थी, उसके पास दीपक जल रहा था, परन्तु आस पास इतनी अधिक धुल जमी थी, कि यह समझ नहीं आ रहा था, कि जिसने दीपक जला कर रखा है, क्या वह साफ सफाई नहीं करता है|

कुछ भी हो, मैं प्रसन्न अवश्य था, कि मुझे रात्रि में वर्षा से भीगना नहीं पडेगा| यही सोचकर मैंने उस स्थान की साफ सफाई की, मूर्ती पर जमी धुल को झाड-पौंछ कर साफ कर दिया और उस कक्ष को दीपक की रोशनी में पूरा साफ कर लकड़ी के एक तख्ते पर, जो वहीँ रखा था, पर लेट गया, एक मस्त संन्यासी की भांति| दिन भर की थकावट से थोड़ी ही देर में मुझे नींद आ गई|

रात्रि  का दूसरा पहर था, मुझे ऐसा लगा कि धरती हिल रही है और मैं अपने को सम्हाल नहीं पा रहा हूं, वातावरण दुर्गन्ध से भर गया, ऐसा लगा जैसे कोई जानवर पास ही कहीं मर गया हो| मैंने दुर्गन्ध से नाक बंद कर ली, परन्तु आँख से जो दृश्य दिखा उससे मेरी घिग्घी बंध गई - सामने एक औघड लाल लाल आँखें किए मुझे घूरे जा रहा था, उसके हाथ में एक लंबा फरसा था, उसके पुरे शरीर पर गुप्त अंगो को ढकने के अलावा कुछ भी न था| पूरा बदन बेडौल और वीभत्स, कि देखते ही व्यक्ति बेहोश हो जाय| वह दुर्गन्ध उसके ही शरीर से आ रही थी| अब वह मेरी ओर बढ़ रहा था, और मुझे घबराया हुआ देखकर वह जोरों से अट्टाहास करने लगा|

मैं बुरी तरह घबरा गया था, मुझे साक्षात अपनी मृत्यु ही दिखाई दे रही थी, त्योंही मैंने मन्दिर के द्वार के बाहर भागने की कोशिश की, वह भी मेरी ओर जोरों से लपका| मैं पुरी जान लगाकर अंधाधुंद भागता रहा, काफी दूर निकल जाने पर मुझे एक संन्यासी के दर्शन हुए| संन्यासी को देखते ही मेरा भय जाता रहा, मुझे ऐसा लगा कि इस संन्यासी के होते हुए मेरा कोई भी अमंगल नहीं हो सकता है| संन्यासी ने मुझे निर्भय होने के लिये कहा, और बताया कि जिस मन्दिर में तुम अभी थे, वह तुम्हारी कुल की देवी - जंगल माई का मन्दिर है| बस्ती से दूर होने के कारण यह मन्दिर बिल्कुल ही उपेक्षित सा हो गया है| इस मन्दिर में तुम्हारे ही पूर्वजों ने देवी मूर्ती स्थापित की थी, आज से बीस वर्ष पूर्व तक भी लोग इस मन्दिर में पूर्णिमा के दिन और हर शुभ अवसर पर आकर पूजा आदि करते थे, पर अब इसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है| इसी वजह से इतर योनियों का यहां बसेरा हो गया है, जिससे देवी अप्रसन्न है| यदि इस मन्दिर में पुनः लोग आने लगे, तो उन्हें जंगली माई की कृपा प्राप्त हो सकेगी|

यह बोलकर संन्यासी ने मेरे सर पर हाथ फेरा, मुझे मन में बड़े आनन्द की अनुभूति हुई| मेरा रोम-रोम खिल उठा था, इसी आनन्दतिरेक में मेरी आँख खुल गईं, मैंने देखा कि सुबह होने वाली है, और मैं स्वप्न देख रहा था| आँख खुलने के बाद मुझे मन में विशेष प्रसन्नता अनुभव हो रही थी, मैंने मन्दिर की पुरी धुलाई की, मूर्ती को जल से साफ किया और मन्दिर के बाहर लगे कुछ फूलों को तोड़कर मैं देवी प्रतिमा पर अर्पित किए और प्रणाम कर घर की ओर वापस लौट आया|

रात भर घर न पहुंच सकने के कारण घर पर लोग चिंतित थे, परन्तु मुझे सकुशल पाकर प्रसन्न हो गए| मन्दिर में रात्रि व्यतीत करने वाली घटना मैंने घर में सभी को बताई, तो मां ने मुझे वहां पर फिर न जाने की हिदायत दी| मां ने कहा - 'उस मन्दिर में कोई जाता नहीं है, वहां पर रात में औघड़ तांत्रिक नर बलि एवं पशु बलि दे कर कई क्रियाएं करते हैं| वहां पर जो भी जाता है, वह या तो पागल हो जाता है, या उसकी मृत्यु हो जाती है| अब तुम उधर कभी मत जाना|'

मेरा परिक्षण कर मां ने जब मेरा माथा छुआ, तो बोली, - 'तेरा माथा तो तप रहा है, तुझे तो तेज बुखार है, यह सब उस मन्दिर में जाने से ही हुआ है|'

बुखार में ही लेटा रहा घर में रात्रि मुझे पुनः स्वप्न आया, और मुझे पुनः संन्यासी के दर्शन हुए उन्होनें कहा - 'बेटा! तू व्यर्थ में परेशान हो रहा है, तेरी तबीयत तो वर्षा में भीग जाने से खराब हुई है, वैसी कोई बात नहीं है जसी तू या तेरे घर वाले सोच रहे हैं|  उल्टे जंगली माई तो तुम पर बहुत प्रसन्न है, तुने मन्दिर की धुलाई कर, मूर्ती साफ कर उस पर पुष्प चढ़ाएं हैं इतने वर्षों के बाद| वहा कोई औघड नहीं है, तू वहां नित्य सुबह जाकर फूल चाढाएगा तो  तेरा कल्याण होगा, देवी स्वयं तेरा कल्याण करने को आतुर है|'

दुसरे दिन प्रातः निद्रा खुली तो यद्यपि बुखार तो अभी भी था, परन्तु मैं मन में पुरी तरह आश्वस्त था कि निश्चय ही मेरे जीवन में किसी शक्ति की कृपा हो रही है| पिताजी की औषधियों से दो दिन में मैं स्वस्थ हो गया और अगले दिन से नित्य सुबह मैं उस मन्दिर में जाता, वहां साफ सफाई कर पुष्पादि चढ़ाकर अगरबत्ती आदि लगाकर आ जाता| मात्र इतनी ही थी मेरी पूजा या साधना| परिणाम यह हुआ कि कुछ ही दिनों में मुझे देवी के दर्शन हुए और उसके बाद फिर एक के बाद एक मुझे सफलता मिल गई, प्रतिभा और क्षमता का ऐसा विकास हुआ कि कॉलेज में उच्च स्थान आने लगा, बाद में उच्च श्रेणी का सरकारी पद प्राप्त हुआ, घर परिवार में हर प्रकार के साधन उपलब्ध हो सके, ये सब मात्र बचपन में कुलदेवी के मन्दिर में की गई सेवा के फलस्वरूप हुआ है|

आज के कुछ वर्ष पूर्व मैं किसी कार्यवश ट्रेन द्वारा यात्रा कर रहा था कि गुजरात वडोदरा स्टेशन पर एक सज्जन से मेरी मुलाक़ात हुई जो कि मेरी ही सीट के सामने आकर बैठे थे| उनके हाथ में 'मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान' का जुलाई-९३ का अंक देखा, जिस पर सदगुरुदेव निखिलेश्वरानन्द जी का संन्यासी चित्र छपा था| कवर के चित्र को देख कर मैं एकदम से चौंक गया, क्योंकि वह चित्र बिल्कुल उस संन्यासी के चेहरे से मिलता था, जिन्होनें मुझे मेरी कुल देवी के बारे में जानकारी दे कर स्वप्न में मुझे उनकी सेवा करने का आदेश दिया था| बाद में मैंने उन सज्जन द्वारा जानकारी प्राप्त कर पूज्यपाद सदगुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली अर्थात स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी से गुरु दीक्षा प्राप्त की| उन्हीं ने मुझे कुलदेवता/देवी की प्रामाणिक साधना स्पष्ट की, जिससे मैं अपनी कुलदेवी और कुल देवता के पूर्ण दर्शन कर कृत-कृत्य हो सका|

आज भी जब भी मैं किसी समस्या से ग्रस्त हो जाता हूं, तो मुझे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कुलदेवी के दर्शन हो जाते हैं| समय बीता और मैं तो शहर चला गया पर गाँव के सदस्य आज उस मन्दिर में बड़ी श्रद्धा से जाकर पूजन करते हैं, आज वहां एक पुजारी अलग से नियुक्त है| कुलदेवी की कृपा से आज गाँव में हमारे कुल के सभी घरों में सम्पन्नता है, और लोग विकास कर रहे हैं| उसके बाद तो पूज्य गुरुदेव के सान्दिध्य में मैंने और भी साधनाएं संपन्न की, परन्तु जो सफलता और प्रत्यक्षीकरण की स्थिति मुझे इस साधना में मिली उतनी अधिक सफलता मुझे अन्य साधानाओं में न मिल सकी| निश्चय ही कुल देव या देवी अपने कुल के मनुष्यों के संरक्षक होते हैं, परन्तु जब हम स्वयं ही अपने कुल के देवता की सहायता न लेकर अन्य कही भटकते हैं, तो उन्हें कष्ट होता है, और वे सहायता करना चाहते हुए भी असमर्थ हो जाते हैं, और फिर उन के खिन्न या रुष्ट रहने पर परिवार में समृद्धि, सुख, सफलता होनी चाहिए थी, वह हो नहीं पाती हैं|

-मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान, जनवरी २००७